वर्तमान जीवन का सत्य – गौतम बुद्ध वचन

भगवान गौतम बुद्ध के अनमोल वचन – हम जैसा सोचते हैं, वैसा बन जाते हैं।

वर्तमान जीवन का सत्य (TRUTH OF LIFE OF PRESENT DAY) आज इस इक्कीसवी सदी में क्या आप अपना जीवन अपने हिसाब से जी रहे है, या आप भी अपनी जिंदगी दुसरो के इशारो पर कठपुतली कि तरह जी रहे है? यह बात कडवी है पर सत्य यही है कि, हम कैसे अपना जीवन व्यतीत करेंगे यह भी दुसरे लोग निर्धारित करेंगे। आप भी तो हमेशा दुसरो कि नजरो में बेहतर बनने के लिए ही कर्म करते रहते है। आप हर वह कर्म करते है जिस से आप दुसरो कि नजरो में ऊपर उठ सके, और वह सामने वाला व्यक्ति कह सके कि तुम्हारे जैसा व्यक्ति मैंने आज तक अपने जीवन में नही देखा है।

तुम महान हो, तुम अच्छे कर्म करो या बुरे कर्म सब कुछ दुसरो के लिए ही तो है। तुम अपने लिए कब जिए हो? कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि पुरे जीवनकाल में तुम अपने लिए जीते ही नही हो सब दुसरो को दिखाने के लिए करते हो। इसलिए तुम सब पुरे जीवनकाल अपूर्णता में मरते रहते हो। तुम्हे समझ में ही नही आता है कि इतनी भाग दौड़ कर ये धन दौलत कमा कर, इतना मान सम्मान कमा कर, जो चाहिए था वह भी पाकर हम अंत में भिखारी ही रह जाते है। कोई सम्राट नहीं हो पाता है। और इस सम्राट को दुनिया नहीं जितनी है सिर्फ अपने आप को ही जितना है। जिसने भी अपने आप को जीत लिया वह एक महान सम्राट कहलायेगा। तुम्हारी जिंदगी इस बात पर अटकी है कि लोग क्या कहेंगे? (सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग) आप लोगो कि नजरो में बेहतर होना चाहते है।

लेकिन आप कितना भी बेहतर हो जाए लोग तो कुछ न कुछ कहेंगे ही। यहाँ तो लोग भगवान से भी दुखी है। भगवान् को भी भला बुरा कह देते है। तथागत गौतम बुद्ध जैसे महान बौद्ध को भी लोग भला बुरा कहते है। तो आप क्या चीज है जबकि गौतम बुद्ध से पवित्र और सम्पूर्ण जीवन किसी का नही है। इसलिए लोग क्या कहेंगे इस बात को जीवन से निकाल कर बाहर फेक दीजिये और अपने आप को पहचानिए।

बाहरी दुनिया ने आपको एक कठपुतली(robot) कि तरह बना दिया है। हम भीड़ का हिस्सा होते जा रहे है। मानने लगे है कि जो भीड़ करती है वही सही है। जो भीड़ हो रही है हमें भी वही बनना है। हम अपने आप को इस भीड़ में भूल गये है। हम भीड़ हो गये है। हम कठपुतली हो गये है इस भीड़ के हाथो कि। हमने जीना ही छोड़ दिया है केवल पीछे भागना सिख रहे है। कुछ ही लोग है जो इस दुनिया में वास्तव में अपना जीवन जी रहे है। और वह लोगो को भी जीवन जीना सिखा है। लेकिन ऐसे लोगो को यह भीड़ पागल समझती है।

एक कहानी है कि एक सम्राट के यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ, वह उस सम्राट का इकलौता पुत्र था। उस बच्चे को कुछ भी पता नही था। नवजात को वैसे भी क्या पता होगा। लेकिन उसके सम्राट पिता ने उसके लिए पुरे जीवन कि रूपरेखा खीच डाली थी। वह क्या होगा? कैसे वह एक भावी सम्राट बनेगा? और न जाने क्या क्या सब कुछ सोच रखा था। लेकिन हम सब एक nature एक स्वाभाव के साथ पैदा होते है और वही हमारे जीवन कि धारा होती है। एक नदी कि तरह साफ़ और स्वच्छ, उस धारा को हमने खो दिया है। और अपना लिया है भीड़ तंत्र द्वारा दिया गया एक गंदा नाला क्योकि हमें यह ज्यादा सुरक्षित और सही लगता है। कुछ खोजना और कुछ जानना हमने बंद कर दिया है।

उस बच्चे का भी एक स्वभाव(nature) था। उसे सम्राट नहीं बनना था। उस बच्चे का मन नाजुक था। वह जल्दी ही करुना से भर जाता था। हिंसा में उसे आनंद नहीं आता था। उसे नृत्य करना पसंद था। उसे चित्र बनाना पसंद था। यही उसकी जीवन धारा थी। जिसपर अगर वह चलता तो सम्पूर्णता को प्राप्त करता। लेकिन उसके पिता को यह पसंद नहीं था। वह अपने पुत्र से नाराज़ रहने लगा। उसने हर वह जतन किया जिससे वह अपने पुत्र में एक सम्राट के गुण डाल सके। लेकिन बच्चे पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। धीरे धीरे बच्चा बड़ा होने लगा, बच्चो कि ख़ास बात होती है कि दुनिया में क्या हो रहा है, उन्हें इस बात से कोई मतलब न नही होता है। वह जो है बस वही रहते है।

लेकिन अब वह बच्चा बड़ा हो रहा था। समाज से कुछ चीजे उसके भीतर आ रही थी। अब वह बाहर के बारे में भी सोचने लगा था। लेकिन स्वभाव तो उसका अभी भी वही पहले वाला ही था। वह सम्राट अपने पुत्र से बहुत नाराज़ रहने लगा। वह उसे बात बात पर ताने मरता। और कहता कि तुम्हारे जैसा पुत्र होने से अच्छा मेरा कोई पुत्र ही नही होता। लोग कितना हस्ते है मुझपर। तुम जानते हो वह मेरे बारे में कैसी कैसी बाते करते है? और यह सब तुम्हारी वजह से है। पुत्र को पिता कि बाते लग गयी थी।

उसने निश्चय किया कि वह केवल अपने पिता के लिये ही अपने आप से समझौता करेगा। और वह सारे कार्य करेगा जो उसके पिता चाहते है। एक बार पिता खुश हो जायेंगे तो वह अपना साधारण जीवन जियेगा। वह एक योद्धा बना, एक ऐसा योद्धा जिसे हरा पाना नामुमकिन था। उसने कई लड़ाईयां लड़ी, उसमे वह विजयी हुआ। हर बार उसे लगता कि उसके पिता उससे खुश हो जायेंगे। लेकिन हर बार उसके पिता सम्राट कहते अभी तुम्हे और सीखना है। अभी तुम पुरे नही हुए हो। पिता कि नजरो में पूरा होने के लिए पुत्र ने अपनी पूरी ताकत लगा दी लेकिन वह समय कभी आया ही नही। वह पुत्र भी अपने आप को भूल चूका था। उसके अन्दर कि करुना क्रूरता बन गयी थी।

हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही होता है। हम लोगो कि परवाह करते करते जिम्मेदारियों को निभाते निभाते हम अपने आप को भूल ही जाते है। और एक ऐसी जिंदगी को अपना लेते है जो कभी हमारी हो ही नहीं सकती। खुश किश्मत है वह लोग जो वही जीवन जीते है जो वह है। वह खुलकर इस जीवन का आनंद लेते है।

एक दीन उस युवराज कि नज़र गाव कि एक युवती पर पड़ी। उसे देखते ही युवराज के मन में उस युवती के लिए प्रेम उमड़ आया। उसने उस युवती को अपने राजहल में बुलवाया और उस युवती के सामने हीरे जवाहरात के एक से एक ढेर लगा दिए। और उस युवती से कहा कि मै तुमसे प्रेम करता हूँ। यह सब कुछ तुम्हारे लिए है। सब एक से एक कीमती है। तुम मेरे प्रेम को स्वीकार करो। युवती ने कहा तुम मुझसे प्रेम नही करते हो तभी तो यह कंकड़ पत्थर मुझे दिखा रहे हो। यदि प्रेम करते हो तो मुझे तुमसे तुम्हारी सबसे कीमती चीज चाहिए, क्या दे सकोगे? युवराज ने कहा जो चाहे मांग लो सब कुछ तुम्हारा ही तो है।

युवती ने कहा यह सब मुझे नही चाहिए। क्या तुम एक साधारण युवक कि तरह मेरे साथ चल सकोगे, छोड़ सकोगे अपना पद, अपना राज्य, यह धन दौलत और अपना राजमहल। हमारी जिंदगी में भी कुछ ऐसा ही है। धन दौलत, मान सम्मान, पद प्रतिस्ठा ही प्रेम कि कसौटी बन जाता है। आपने देखा होगा जिसके पास जितनी ज्यादा धन दौलत पद प्रतिष्ठा होती है लोग उसे अधिक प्रेम करते है। उसकी फ़िक्र करते है। हमेशा उसके साथ खड़े रहते है। यह अलग बात है कि यह सब झूठा और केवल दिखावा होता है। और इन सब झूठ और दिखावे को पाने के लिए हम सब दौड़ते रहते है। भागते रहते है। अंतिम सास तक। गरीब से न कोई प्रेम करना चाहता है और न ही कोई उसके साथ खड़े रहने को तैयार रहता है। लेकीन वह भी तो यह सब चाहता ही है। झूठा प्रेम लालच से जुड़ा होता है।

लेकिन शायद वह युवराज उस युवती से सच्चा प्रेम करता था इसलिए उसने उस युवती से कहा कि मै तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार हूँ बस मै अपने पिता को इसकी सुचना देकर आता हूँ। जैसे ही पिता को पता चला कि उसका पुत्र राज्य छोड़कर जानेवाला है और वह भी एक साधारण सी लड़की के लिए, पिता ने जासूसी के आरोप में उस लड़की को मृत्युदंड कि सजा सुना दी। जब हमारे हाथ में अधिकार होते है, शक्ति होती है। तब हम न्याय और अन्याय का फर्क भूलने लगते है। हम अपने आप को सर्वशक्तिमान समझने लगते है। शक्तिहीन गरीबो कि जिंदगी हमारे लिए कोई मायने नही रखती है। मायने रखता है तो बस अपने स्वार्थ सिद्धि को पूरा करना। एक मौका मिलता है हमें सेवा करने का लेकिन उसे भी हम खो देते है। और जब इन कर्मो का फल वापस हमें मिलता है तब हम बड़े भोले बनकर कहते है कि मेरा क्या दोष है, मै ही क्यू?

युवराज को जब यह पता चला तो वह अपने सम्राट पिता के पास गया, उसने अपने पिता को समझाया लेकिन पिता नहीं समझे। तब उसने पिता से विनती कि कि वह उस युवती को छोड़ दे और इसके बदले में जो वह कहेंगे वह जीवन भर उसका पालन करेगा। पिता इस बात से खुश हो गए और उस युवती को छोड़ दिया। पिता ने युवराज का विवाह एक राजकुमारी के साथ कर दिया। वह राजकुमारी बहुत महत्वकांक्षी थी। वह जल्द से जल्द महारानी बन जाना चाहती थी। इसके लिए युवराज का सम्राट बनना आवश्यक था। पति पत्नी के जीवन में यदि प्रेम कि जगह महत्वकांक्षा लेले तब उनके जीवन में दुख के सिवाय कुछ भी उत्पन्न नहीं होने वाला। और आजकल तो पति और पत्नी दोनों ही महत्त्वकांक्षी है। प्रेम के लिए इनके जीवन में जगह बचती ही नही है। और जिसे वह प्रेम समझते है वह लालच पर टिका हुआ स्वार्थ ही होता है।

राजकुमारी राजकुमार से कहती है कि सम्राट अब बूढ़े हो चुके है, तुम्हे उनकी जगह ले लेनी चहिये। अब वह राज काज ठीक से चलाने के काबिल नही रहे। बुढापे में अक्सर ऐसा होता है कि सब आपको छोड़ने लगते है। आप बोझ बन जाते है। और वह प्रेम जो स्वार्थ पर टिका हुआ था वह गिर जाता है। आप अकेले रह जाते है। लेकिन सभी के साथ ऐसा नहीं होता है। कुछ को तो बुढापे में और अधिक प्रेम कि प्राप्ति होती है। उनके बच्चे उनकी सेवा निस्वार्थ भाव से करते है। और इसका कारण केवल इतना ही है कि उन माता पिता ने अपने प्रेम में स्वार्थ कि मिलावट नहीं कि होगी।

राजकुमार को राजकुमारी कि बाते सही लगने लगी थी। राजकुमार को पता ही नही था कि वह अपने पिता से नाराज़ रहने लगा था। बचपन से वह अपने पता से नाराज़ चल रहा था। इसी नाराज़गी के कारण अपने अंतर मन में अपने पिता के लिए वह क्रोध को पलता रहा। वह अपने पिता के पास गया और उनसे कहा कि पिताजी आप बूढ़े हो चुके है आपको अब आराम करना चाहिए। आपको मुझे सम्राट घोषित कर देना चाहिए। इसे अब मै संभाल लूँगा। सम्राट पिता ने कहा अभी तुम इस काबिल नहीं हुए हो। पहले काबिल हो जाओ तब मै स्वयम तुम्हे सम्राट घोषित कर दूंगा। वक्त बीतता गया चीजे बदलती चली गयी और वह राजकुमार अपने पिता का दुश्मन बन गया। राजकुमारी ने राजकुमार को पिता को रास्ते से हटाने का एक उपाय बताया।

उस समय युद्ध चल रहा था। पिता को युद्ध में वीरगति को प्राप्त कराने का सारा प्रयास था। पिता को युद्ध के दौरान अकेले में पीछे से मारने का षड्यंत्र रचा गया था। लेकिन युद्ध में युवराज दुश्मन के बीच अकेला फस गया। पिता ने यह देखा तो वह घोड़े पर सवार होकर पुत्र कि ओर दौड़ा। पुत्र ने सोचा कि अच्छा मौका है वह तलवार लेकर पिता कि ओर बढ़ा लेकिन तभी किसी ने पुत्र पर भाले से प्रहार किया और पिता सम्राट ने पुत्र को बचने के लिए अपने आप को भाले के आगे कर दिया। सम्राट जमीं पर गिर गया। यह सब देख युवराज के हाथो से तलवार छुट गयी। वह अपने पिता को घोड़े पर लादकर वह से निकल आया। रास्ते में पिता ने पुत्र से कहा अब तुम काबिल हो गये हो। अब मै तुम्हे सम्राट घोषित करता हूँ जाओ और अपने राज्य को बचा लो यह कहकर सम्राट वीरगति को प्राप्त हो गया।

युवराज का क्रोध करुना में बदल गया, उसे महसूस हुआ कि वह अपने पिता से प्रेम करता है नफरत नहीं। उसे अपने आप से आत्मग्लानी होने लगी। उसने वह युद्ध तो जित लिया लेकिन अपने आप को हार गया। हमारे आसपास ऐसे बहुत से लोग होते है जिनकी बाते हमें अच्छी नही लगती है, वे हमेशा कडवी बाते ही करते है, और वह हर बात जो हमें सच का आइना दिखाती है वह कडवी ही लगती है। हम ऐसे लोगो को ढूंढ़ते है जो हमारी हा में हा मिलाते रहे। हम गलत है तब भी हमें यह न बताये कि हम गलत है। लोग हमें बहका सकते है क्योकि हम पहले से ही बहकने के लिए तैयार बैठे है। हम जो भी कर रहे है वह सही है बस ऐसा कहने वाले लोग ही हमें पसंद आते है।

राजकुमार ने अपनी पत्नी को षड़यंत्र रचने के जुर्म में कारावास में डलवा दिया। वह स्वयम को भी सजा देना चाहता था। सम्राट बने रहने में अब उसकि कोई इच्छा नही थी। एक दिन वह अकेले अपने राज्य में भ्रमण पर निकला। रस्ते में उसने एक व्यक्ति को मस्त होकर नाचते गाते देखा। वह उस व्यक्ति के पास गया और उससे पूछा कौन हो तुम? उस व्यक्ति ने कहा कौन हूँ मै? यही तो मुझे नही पता कि मै कौन हूँ। यही तो मै जानना चाहता हूँ कि कौन हूँ मै? क्या तुम जानते हो कि तुम कौन हो? युवराज ने कहा मै यहाँ का सम्राट हूँ। उस व्यक्ति ने कहा कि मुझे भी यही लगता था कि मै यहाँ का सम्राट हूँ लेकिन बाद में पता चला कि मुझसे बड़ा भिखारी कोई नही है। युवराज ने कहा तुम समझ नहीं रहे हो मै वास्तव में यहाँ का सम्राट हूँ। उस व्यक्ति ने कहा कि मै जनता हूँ कि तुम यहाँ के सम्राट हो, कभी मै भी यहाँ का सम्राट ही था।

मैंने ही यह राज्य तुम्हारे पिता को अपने हाथो से सौपा था। तुम्हारे पिता मेरे सेनापति हुआ करते थे। और तुम्हारे पिता ने जिस लड़की को जासूसी के लिए मृत्युदंड दिया था वह मेरी पुत्री है। युवराज उस व्यक्ति के चरणों में गिर गया और कहा मैंने अपने पिता से आपके बारे में सुना था, आप ही मुझे बताये कि मुझे क्या करना चाहिए? मै सम्राट नहीं बनना चाहता। वह व्यक्ति सम्राट को अपने साथ एक जगह पर लेकर गया और कहा सामने देखो उस विशाल वृक्ष को। इसी वृक्ष कि तरह सम्राट बनो। इस वृक्ष पर कई तरह के प्राणी वास करते है। यह सब इस वृक्ष कि प्रजा है। और यह वृक्ष सबका ख्याल रखता है। सबकी रक्षा करता है। सबको भोजन देता है। हम जैसे पापी इंसानों को भी यह वृक्ष छाव, भोजन और लकड़ी देता है। और देखो तो जरा इसमें जरा सा भी अहंकार नहीं है। यही असली सम्राट है।

लोगो को सताना, ज़मीन छीन लेना, युद्ध में रक्त बहाना यह असली सम्राट का कार्य नही है। जाओ और अपनी प्रजा कि सेवा और रक्षा ऐसे करो जैसे यह वृक्ष करता है। तब तुम महान सम्राट बनोगे। अपने लिए जिओ लोगो को दिखाने के लिए नहीं। अपने आप को पहचानो, जिसमे खुशी मिले वही कार्य करो। हम सब भटक गए है और काल्पनिक दुनिया में जी रहे है। जहा हर कोई किसी न किसी को बांधकर घसीट रहा है। ध्यान से देखेंगे तो पता चलेगा हमारे विचार हमारे है ही नहीं। हमारी सोच भी हमारी नहीं है। हम हिन्दू परिवार में पैदा हुए तो हिन्दू हो जाते है, मुस्लिम परिवार में पैदा हुए तो मुस्लिम, सिख परिवार में पैदा हुए तो सिख, इसाई परिवार में पैदा हुए तो इसाई, कभी सोचा है कौन है जो हमें यह सब बना रहा है? अंतर में तो हम सब एक ही है।

एक काल्पनिक व्यवस्था लागु कर दी गयी है। जो हमें यह बताती है कि हम इस धर्म के इस जाती के है और हम दुसरे धर्म या जाती के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। विश्वाश करना यह सत्य है कि इश्वर ने या भगवान् ने यह जाती या धर्म नहीं बनाया है। हम सब दिखावे के लिए जी रहे है। बस इसलिए कि हम भीड़ हो गये है। जो भीड़ को मंजूर वही सही है। वह एक अकेला हो जाता है यहाँ पर जो स्वयं को जानने के लिए निकलता है। और लोग उससे भी पूछते है किस धर्म से या किस जाती से हो और तब यदि वह हस दे तो कहते है कि पागल है। उस राजकुमार को तो बात समझ में आ गयी वह अपने स्वाभाव पर वापस लौट आया जहा करुना और प्रेम था।

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