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Tulsi se tulsidas banne ki kahani | तुलसी से तुलसीदास बनने कि कहानी

Tulsi se tulsidas banne ki kahani – आज हम जानेंगे कि संत तुलसीदास जी तुलसी से तुलसीदास कैसे बने? क्या कहानी है इसके पीछे आइये विस्तार से जानते है। ये बड़ी ही रोचक कहानी है। तुलसीदास जी कि यह कहानी हमें बहुत कुछ सिखाती है।

तुलसीदास जी भी एक सामान्य व्यक्ति थे उनका नाम तुलसी था। कहा जाता है कि माता-पिता ने तुलसीदास को बचपन में ही त्याग दिया था। तुलसीदास जी का बचपन अनेक कष्टों में व्यतीत हुआ। इनका पालन-पोषण प्रसिद्ध संत नरहरी दास जी ने किया और इन्हें ज्ञान एवं भक्ति की शिक्षा प्रदान की।

जैसे ही तुसलीदास जी थोड़े बड़े होते है तब उनकी शादी करा दी जाती है। तुलसीदास जी कि पत्नी का नाम रत्नावली था। तुलसीदास जी अपनी पत्नी रत्नावली से बहुत प्रेम करते थे। तुलसीदास जी एक सामान्य आदमी कि तरह रोज गाय को चराने लेकर जाया करते थे और शाम को उन गाय को घर लेकर आते थे। यही उनकी रोज कि दिनचर्या थी।

तुलसीदास जी जब शाम को गाय चरा के घर लौटते तब कभी जब वे अपनी पत्नी रत्नावली को घर पर उपस्थित नहीं पाते तो वह बहुत चिंतित हो जाते थे। उन्हें अपनी पत्नी रत्नावली कि बहुत ही ज्यादा चिंता होने लगती थी। वे अपनी पत्नी रत्नावली को ढूंढने निकल जाते थे और जब रत्नावली मिल जाती थी तब जाकर उन्हें चैन मिलता था।

तुलसीदास रोज गाय चराने जाते थे लेकिन दिनभर अपनी पत्नी रत्नावली का ही नाम जपते रहते थे। वे दिनभर अपनी पत्नी को याद करते रहते थे।

एक दिन रत्नावली तुलसीदास जी से कहती है कि तीज का त्यौहार बहुत नजदीक आ गया है। गाव गाव में झूले पड़ने सुरु हो गये है। सभी महिलाओं के भाई उन्हें लेने के लिए आये है। इसलिए मुझे भी लेने के लिए मेरे भाई आएंगे।

यह सुनकर तुलसीदास जी बहुत उदास हो जाते है और अपने पत्नी रत्नावली से कहते है कि यदि तुम मुझे छोड़कर चली जाओगी तो मै यहाँ अकेले कैसे रहूँगा? तुम्हारे बिना मै एक पल भी नहीं रह सकता हुँ।

तुलसीदास जी नही मानते है, लेकिन रत्नावली जी कहती है कि बस कुछ दिन कि ही तो बात है। कुछ दिनो के बाद मै फिर से आ जाउंगी। आप चिंता मत करो, आप दिनभर गाय चराना और शाम को खाना खाकर आरम से सो जाना।

बस कुछ ही दिन कि बात है ऐसे ही बित जायेंगे। तुलसी जी अपनी पत्नी कि बात मान जाते है और उनको मायके जाने कि आज्ञा दे देते है। तब रत्नावली अपने मायके चली जाती है। तुसिदास गायो को चाराने के लिए जंगल में चले जाते है और दिनभर अपनी पत्नी का ही नाम जपते रहते है।

इस तरह से उनका दिन कट जाता है और शाम को सभी गायो को लेकर घर आ जाते है। जब तुलसीदास घर पे आते है तब घर के दरवाजे बंद दिखाई देते है तब तुलसीदास जी रत्नावली को बुलाते है लेकिन रत्नावली वहाँ नही होती है। वह तो अपने मायके चली गई थी।

तुसलीदास जी को कुछ समझ में नही आ रहा था कि वे क्या करे उनका घर पर बिलकुल मन नही लग रहा था। उन्हें एक पल भी चैन नही मिल रहा था। तुसलीदास जी घर के अन्दर जाकर बैठ जाते है उनके मन में उनकी पत्नी के ही ख्याल आ रहे थे।

रत्नावली कि याद ने उन्हें व्याकुल कर दिया था। बाहर जोरो से बारिश होने लगी हर तरफ पानी पानी हो गया था। तुलसीदास जी से व्याकुलता बर्दाश नहीं हो रही थी इसलिए वे मध्यरात्रि में बारिश के कम होने पर घर से निकल पड़े अपनी पत्नी रत्नावली से मिलने के लिए।

तुलसीदास जी इतने व्याकुल थे कि उन्हें रत्नावली के अलावा कुछ भी सूझ नहीं रहा था। बारिश के कारण हर तरफ कीचड़ हो गया था उस कीचड़ में चलते चलते तुलसीदास जी के कपड़ो पर भी काफी कीचड़ लग गया था।

आधे रास्ते तक पहुचते पहुचते तुलसीदास जी कीचड़ में सन चके थे। आधे रास्ते के बाद एक नदी के पास पहुचते है। तेज बारिश के कारण नदी के पानी में तेज बहाव था और नदी के पानी का स्तर भी उपर आ गया था।

तुलसीदास जी नदी के किनारे खड़े होकर सोचते है कि इस नदी को कैसे पर करू और रत्नावली के पास पहुच जाऊ। यही सब सोचते हुते तुलसीदास नदी के किनारे खड़े रहते है, तभी तुलसीदास जी को एक नाव जैसी चीज बहती हुई उनकी तरफ आती दिखाई दे रही थी।

तुलसीदास जी सोचते है कि मेरी पत्नी बहुत समझदार है वह भी मुझसे बहुत प्रेम करती है, वह मेरे बिना एक पल भी नही रह सकती है। इसलिए तो उसने मुझे यह नदी पार करने के लिए यह नाव भेजी है। लेकिन वह नाव नहीं थी वह एक मुर्दा बहता हुआ आ रहा था।

तुलसीदास उस मुर्दे को नाव समझकर उसपर सवार हो जाते है। पानी के बहाव के साथ धीरे धीरे तुलसीदास जी नदी को पार कर लेते है, और रत्नावली का नाम जपते रहते है। और अपने ससुराल अपनी पत्नी के घर के नजदीक पहुच जाते है।

तुलसीदास देखते है कि मकान के सारे दरवाजे बंद थे अन्दर जाते का कोई रास्ता खुला नही था। तब तुलसीदास जी उस मकान के पीछे जाते है वहा से वे देखते है कि जिस कमरे में उनकी पत्नी सो रही थी उस कमरे में एक दीपक जल रहा था।

उस दीपक को देखकर तुलसीदास जी बड़े प्रसन्न होते है वे सोचने लगते है कि मेरी पत्नी को भी नींद नहीं आ रही है वह भी मेरा इंतजार कर रही है। वह भी मुझसे बहुत प्रेम करती है। इसलिए आधी रात तक जाग रही है, और अपने कमरे में दीपक जला रखा है।

तुलसीदास जी अन्दर रत्नावली के कमरे में जाना चाहते थे लेकिन अन्दर जाने के सभी दरवाज़े बंद थे सभी लोग सो रहे थे। तभी तुलसीदास जी को उपर से लटकती हुई एक मोटी रस्सी दिखाई पड़ती है उसे देखकर तुलसीदास जी बड़े ही प्रसन्न होते है और सोचने लगते है कि मेरी पत्नी रत्नावली मुझसे कितना प्रेम करती है वो भी मेरा इंतजार कर रही है।

इसलिए ऊपर चढ़ने के लिए उसने उपर रस्सा लटका दिया है। वह रस्सा नहीं था वह एक अजगर था जो वहा लटका हुआ था तुलसीदास उस अजगर को पकड़कर उपर चढ़ जाते है और अपनी पत्नी रत्नावली के कमरे में जाते है।

वे देखते है कि रत्नावली गहरी नींद में सो रही थी। तुलसीदास रत्नावली को जागते है, और कहते है कि रत्नावली उठो मै आ गया हुँ। रत्नावली कि नींद खुलती है तो वह तुलसीदास को देखकर चौक जाती है।

“लाज ना आई आपको दौरे आयेहु साथ”

और गुस्से में उनसे कहती है कि तुम कितने बड़े मुर्ख हो इस तरह रात में चोरो कि तरह मेरे कमरे में आ गये, आना ही था तो दिन में आये होते तुम्हारा स्वागत होता। इतना प्रेम मुझसे करते हो।

तब तुलसीदास जी कहते है की तुम भी तो मुझसे इतना प्रेम करती हो तभी कमरे में दीपक जला कर रखा है और मुझे आने के लिए नदी में नाव भेजी है, मकान के दरवाजे बंद होने के कारण मुझे ऊपर चढ़ने के लिए तुमने रस्सा लटका दिया है।

तुम भी मुझसे कितना प्रेम करती हो। अपने पति तुलसीदास कि बात सुनने के बाद रत्नावली और भी चौक जाती है और कहती है कि मैंने तुम्हारे लिए कोई नाव नहीं भेजी और न ही मैंने कोई रस्सा लटकाया है तब तुलसीदास अपनी पत्नी से कहते है कि यहाँ देखो अभी भी रस्सा लटका हुआ है।

तब रत्नावली उस रस्सी को देखती है वह रस्सा नहीं अजगर था जिसको पकड़कर तुलसीदास अपनी पत्नी के प्रेम में अंधे होकर उपर चढ़ गये थे। तब रत्नावली तुलसीदास से कहती है अरे मुर्ख जितना प्रेम तुम मुझसे करते हो जो एक मुर्दे को नाव समझकर आ गये एक साप को रस्सी समझ कर आ गये इतने पागल हो गये हो प्रेम में, इतना प्रेम यदि तुमने ईश्वर से किया होता तो तुम्हे मुक्ति मिल गयी होती, तुम्हारा जीवन सार्थक हो जाता।

तब तुलसीदास जी रत्नावली से कहते है कि, भूख न जाने जूठा भात, प्यास न जाने धोबीघाट, नींद न जाने टूटी खाट

रत्नावली मै तुनसे बहुत प्रेम करता हु, तुम्हारे बिना मुझे कुछ भी नहीं दिखाई देता सिर्फ तुम ही तुम दिखाई देती हो।

मुर्ख इन्सान जितना प्रेम तुम मुझसे करते हो इतना प्रेम यदि तुमने इश्वर से किया होता तो तुम्हे मुक्ति मिल गयी होती, तुम्हारा जीवन सार्थक हो जाता। साथ ही साथ मेरा जीवन भी सार्थक हो जाता।

यदि तुम्हारे अन्दर लाज शर्म है तो ईसी समय मेरे घर से निकल जाओ और जाकर भगवान् कि भक्ति करो। मेरे पास तुम्हे देने के लिए कुछ नही है। मेरे अन्दर कुछ भी नहीं है। मेरा यह शारीर भी मिट्टी का है।

इसके पीछे तुम इतना पागल हो रहे हो। इस पागलपन को त्याग दो और इसी समय मेरे घर से निकल जाओ और आज से मुझसे प्रेम करना छोड़ दो। और जितना प्रेम मुझसे किया है उससे तनिक मात्र भी प्रेम यदि तुम ईश्वर से करने लगे तो तुम्हे मुक्ति मिल जएगी।

रत्नावली जी कैसी पत्नी रही होंगी जिन्होंने अपने पति को इतना ज्ञान दिया और प्रभु कि भक्ति में लगा दिया। यदि आज के समय में कोई पुरुष अपनी पत्नी के लिए ऐसे करे तो स्त्री अपने आप को कितना भाग्यशाली मानती है। वह ये सोचती है कि मै कितनी भाग्यशाली हुँ। जो इतना प्रेम करनेवाला पति मुझे मिला है। अपनी पत्नी कि बात सुनकर तुलसीदास उसी समय वहा से निकल गए।

तुलसी कैसे बने संत तुलसीदास,

लेकिन रत्नावली जी ने अपने पति को एक ऐसी प्रेरणा दे दी कि उनका पति तुलसी से तुलसीदास बन गये। और अपनी पत्नी का मोह त्याग करके भगवान् कि भक्ति में लग गये। 

पत्नी की इस फटकार ने तुलसीदास जी को सांसारिक मोह माया से विरक्त कर दिया और उनके हृदय में श्री राम के प्रति भक्ति भाव जागृत हो उठा। तुलसीदास जी ने अनेक तीर्थों का भ्रमण किया और ये राम के अनन्य भक्त बन गए।  तुलसीदास जी ने रामचरितमानस कि रचना कि और हनुमान चालीसा कि रचना कि।

तुलसी तुलसी सब कहे, तुलसी बन की घास, कृपा हो गई राम की बन गए तुलसीदास।।

पूरा नामगोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulsidas)
बचपन का नामरामबोला
पिता का नाम आत्माराम शुक्ल दुबे
माँ का नामहुलसी दुबे
पत्नी का नामबुद्धिमती (रत्नावली)
बच्चो के नाम बेटा  – तारक
शैशवावस्था में ही निधन
जन्मतिथि1511 ई० (सम्वत्- 1568 वि०)
जन्म स्थानसोरों शूकरक्षेत्र, कासगंज , उत्तर प्रदेश, भारत
मृत्यु1623 ई० (संवत 1680 वि०) काशी
गुरु / शिक्षकनरसिंहदास
  
तुलसीदास जी प्रसिद्ध कथनसीयराममय सब जग जानी।
करउँ प्रणाम जोरि जुग पानी ॥
(रामचरितमानस १.८.२)
प्रसिद्ध साहित्यिक रचनायेंरामचरितमानस, विनयपत्रिका, दोहावली, कवितावली, हनुमान चालीसा, वैराग्य सन्दीपनी, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, इत्यादि
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