श्रीमद भगवद गीता से प्राप्त प्रेरणा

भगवदगीता को गीतोपनिषद भी कहा जाता है। यह वैदिक ज्ञान का सार है।

भगवदगीता का मर्म भगवदगीता मे ही व्यक्त है। यह इस प्रकार है की यदि हमें किसी औषधि विशेष का सेवन करना हो तो उसपर लिखें निर्देशों का पालन करना होता है। हम अपने मन से या किसी मित्र की सलाह से औषधि नहीं ले सकते। इसका सेवन लिखें हुये निर्देशों के अनुसार या चिकित्सक के निर्देशों के अनुसार करना होता है। इसी प्रकार भगवदगीता को इसके वक्ता द्वारा दिए गये निर्देशों के अनुसार ही ग्रहण करना चाहिए। भगवदगीता के वक्ता भगवान श्री कृष्ण है। भगवदगीता के प्रत्येक पृष्ठ पर उनका उल्लेख भगवान के रूप मे हुआ है।

निसंदेह भगवान शब्द कभी कभी किसी भी अत्यंत शक्तिशाली व्यक्ति या किसी शक्तिशाली देवता के लिए प्रयुक्त होता है और यहां पर भगवान शब्द निश्चित रूप से भगवान श्री कृष्ण को एक महान व्यक्तित्व वाला बताता है। किन्तु साथ ही हमें यह जानना होगा कि भगवान श्री कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान है, जैसे कि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्क स्वामी, श्री चैतन्य महाप्रभु तथा भारत के वैदिक ज्ञान के अन्य विद्वान् आचार्यो ने पुष्ष्टि कि है। भगवान ने भी स्वयं भगवदगीत मे अपने को परम पुरुषोत्तम भगवान कहा है और ब्रम्ह संहिता मे तथा अन्य पुराणों मे, विशेषतया श्रीमदभागवतम मे, जो भागवतपुराण के नाम से विख्यात है, वे इसी रूप मे स्वीकार किये गये है। अतएव भगवदगीत हमें भगवान ने जैसे बताई है, वैसे ही स्वीकार करनी चाहिए।

यहां पर भगवान अर्जुन को सूचित करते है कि भगवदगीता कि यह योगपद्धति सर्वप्रथम सूर्यदेव को बताई गई, सूर्यदेव ने इसे मनु को बताया और मनु ने इसे इच्छवाकु को बताया। इस प्रकार गुरु परंपरा द्वारा यह योगपद्धति एक वक्ता से दूसरे वक्ता तक पहुँचती रही । लेकिन कालांतर मे यह छिन्न भिन्न हो गई, फलस्वरूप भगवान को इसे फिर से बताना पड़ रहा है – इस बार अर्जुन को कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में। वे अर्जुन से कहते है कि मैं तम्हे यह परम ज्ञान इसलिए प्रदान रहा हु, क्योंकि तुम मेरे भक्त तथा मित्र हो। इसका तात्पर्य यह है कि भगवदगीता ऐसा ग्रन्थ है जो विशेष रूप से भगवद्भक्त के लिए है, भगवद्भक्त के निमित्त है।

आध्यतमवादियो कि तीन श्रेणियाँ है -ज्ञानी, योगी तथा भक्त या कि निर्विशेषवादी, ध्यानी और भक्त। यहां पर भगवान अर्जुन से स्पष्ट कहते है कि वे उसे इस नवीन परम्परा का प्रथम पात्र बना रहे है, क्योंकि प्राचीन परम्परा खंडित हो गई थी।

अतएव यह भगवान कि इच्छा थी कि सूर्यदेव से चली आ रही विचारधारा की दिशा में ही अन्य परम्परा की स्थपना की जाये और उनकी यह इच्छा थी की उनकी शिक्षा का वितरण अर्जुन द्वारा नए सिरे से हो। वे चाहते थे कि अर्जुन भगवदगीता ज्ञान का प्रामाणिक विद्वान् बने।अतएव हम देखते है कि भगवदगीता का उपदेश अर्जुन को विशेष रूप से दिया गया, क्योंकि अर्जुन भगवान का भक्त, प्रत्यक्ष शिष्य तथा घनिष्ठ मित्र था। अतएव जिस व्यक्ति में अर्जुन जैसे गुण पाये जाते है, वह भगवदगीता को सबसे अच्छी तरह समझ सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि भक्त को भगवान से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित होना चाहिए। ज्योही कोई भगवान का भक्त बन जाता है, त्योंही उसका सीधा संबंध भगवान से हो जाता है। यह एक अत्यंत निश्चित विषय है, लेकिन संक्षेप में यह बताया जा सकता है कि भक्त तथा भगवान के मध्य पांच प्रकार का संबंध हो सकता है।

कोई निष्क्रिय अवस्था में भक्त हो सकता है,
कोई सक्रिय अवस्था में भक्त हो सकता है,
कोई सखा रूप में भक्त हो सकता है,
कोई माता या पिता के रूप में भक्त हो सकता है,
कोई दम्पति -प्रेमी के रूप में भक्त हो सकता है।

इस संसार में मनुष्य कुत्तो तथा बिल्लियों के समान लड़ने के लिए नहीं है। मनुष्यो को मनुष्य जीवन की महत्ता समझकर सामान्य पशुओ की भाँति आचरण बंद कर देना चाहिए। मनुष्य को अपने जीवन का उद्देश्य समझना चाहिए और इसका उद्देश्य सभी वैदिक ग्रंथो में दिया गया है, जिसका सार भगवदगीता में मिलता है। यदि हम भगवदगीता के उपदेशो का ठीक से उपयोग करें तो हमारा सम्पूर्ण जीवन शुद्ध हो जायेगा।

shrimad bhagwat geeta saar

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