कंजूस सेठ का चित्र कहानी | हिंदी कहानियाँ

धूर्त सेठ बहुत ही कंजूस और चालक था।

बहुत पहले कि बात है। एक सेठ था, वह बहुत ही कंजूस था। एक रुपये भी खर्च करते समय उसके प्राण निकलते जाते थे। वह काम करवाने के बाद भी लोगो को पैसे देने में परेशान करता था। एक बार चित्रकार से उसने अपना एक चित्र बनवाया। जब चित्रकार ने पैसे मांगे तो उसने कह दिया कि चित्र ठीक नहीं बना है, दोबारा बनाकर लाओ। चित्रकार ने कई चित्र बनाए लेकिन वह सेठ हर बार कह देता कि चित्र ठीक नहीं है।

क्रोधित होकर चित्रकार ने सेठ से सभी चित्रों के पैसे का तकादा कर लिया। धूर्त सेठ बोला कैसे पैसे जब मेरा चित्र ठीक से नहीं बना तो मै किस बात के पैसे दू। चित्रकार अपने घर आया और परेशान था, परेशानी का कारण पूछने उसने अपनी पत्नी को पूरी बात बताई। चित्रकार कि पत्नी बहुत बुद्धिमान थी, वह बोली आप दरबार में जाकर न्याय के लिए फ़रियाद कीजिये। चित्रकार बहुत उदास हो गया था वह चुपचाप मुह लटकाकर बैठ गया।

वह बोला सेठ बड़ा आदमी है लोग उसकी बात का सच मानेंगे। मेरे जैसे गरीब का साथ कौन देगा? चित्रकार कि पत्नी बोली सबके बारे में ऐसा नहीं कह सकते। आप बादशाह के पास जाइए वे बहुत दयालु है। वे भले ही पढ़े लिखे नहीं है परन्तु बहुत बुद्धिमान है। आप वहा जाइए आपको वहा न्याय जरुर मिलेगा।

दुसरे दिन चित्रकार बादशाह के दरबार में पहुच गया और अपना पूरा किस्सा सुना दिया। बादशाह ने चित्रों को लेकर सेठ को दरबार में बुलाया। बादशाह ने सभी चित्रों को गौर से देखकर कहा “तुम्हारे इन चित्रों में क्या कमी है?” सेठ ने कहा इनमे से एक भी चित्र हुबहु मेरे चेहरे जैसा नहीं है। बादशाह मुश्किल में पड़ गये कि न्याय कैसे करे? थोड़ी देर तक विचार करते रहे जब उन्हें कुछ समझ में नहीं आया तो अपने मंत्री को न्याय करने को कहा। मंत्री ने सभी बाते ध्यान से सुनी और तुरंत समझ गया कि सेठ चेहरा बदलने में निपुण है। चित्रकार को पैसे देने न पड़े इसलिए वह नाटक कर रहा है।

उसको सही रास्ते पर लाना जरुरी है। कला और कलाकार का सम्मान करने से कला, संस्कृति कि रक्षा एवं सर्वधन होता है। कला में निपुण कलाकारों कि जहा इज्जत होती है वह देश विश्व विख्यात होता है, इसलिए मंत्री ने चित्रकार से कहा तुम्हारे चित्रों में सचमुच बहुत कमिया है। तिन दिन बाद सेठ का चित्र बनाकर दरबार में लाना। तुम्हे पैसे मिल जायेंगे और सेठ तुम भी दरबार में आकर पैसे दे देना। सेठ घर चला गया, मंत्री ने चित्रकार से कहा तुम तीन दिन बाद बड़ा सा दर्पण लेकर दरबार में आना।

तीन दिन बाद चित्रकार दरबार में आया और सेठ के सामने दर्पण रखकर बोला सेठ तुम्हारा चित्र त्तैयार है। सेठ अपना प्रतिबिम्ब देखकर बोला यह तो दर्पण है। नहीं यही तो असली चित्र है। मंत्री ने सेठ से पूछा सेठ जी यह तो तुम्हारा ही रूप है, है या नहीं। सेठ बोला जी हा। सेठ अपनी चालाकी पकडे जाने पर बहुत लज्जित हुआ। उसने चित्रकार को उसका मेहताना दिया। चित्रकार ने सभी का धन्यवाद किया और चला गया।

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