शेर बनना चाहिए लोमड़ी नहीं, इंसान को शेर के गुण अपनाने चाहिए

सिंह बनो शेर बनो। गीदड़ नहीं। हर इंसान को सिंह होना चाहिए मतलब शेर के गुण होने चाहिए

एक बार एक आदमी बहुत घने जंगल में गया हुआ था उसे वहाँ एक शारीरिक रूप से विकलांग लोमड़ी दिखाई दी वो एक झाड़ी में बैठी हुई थी जिसके पिछले दोनों पैर ख़राब हो गये थे वो उस झाड़ी में ही रहती थी। उस आदमी ने सोचा की ये करती तो कुछ नहीं हैं इसके भोजन, खान-पान की व्यवस्था कैसे होती होगी। ये सोच ही रहा था कि तभी अचानक हलचल हुई जंगल में उसने देखा की वहा एक शेर ने शिकार किया और शेर ने शिकार करके अपना भोजन किया। जैसे शेर की आदत होती है की वो पुरा शिकार नहीं खाता थोड़ा छोड़ देता है उसे जितना भोजन करना था किया और चला गया। लोमड़ी आगे के पंजों से खिसकती हुई शिकार के पास गयी और उसने बाकी शिकार खाया और झाड़ी में फिर आ गयी।

उस आदमी ने सोचा जब इसके लिए भोजन की व्यवस्था हो गयी बिना कुछ करे तो क्या मेरे लिए नहीं हो सकती परमात्मा मेरे मेरे लिए भोजन की व्यवस्था नहीं करेगा, तो वो भी जंगल में बैठ गया की मेरे लिए भोजन की व्यवस्था होगी। एक दिन हुआ , दो दिन हुआ , तीन दिन हुआ उसके लिए भोजन की व्यवस्था नहीं हुई वो भागा भागा गुरु के पास गया और उसने पुरी घटना अपने गुरु को सुनिए की कैसे बिना कुछ करे लोमड़ी की भोजन की व्यवस्था हो गयी थी मेरे लिए नहीं हुई।

तो गुरु ने कहा शेर बन शेर लोमड़ी नहीं, शेर खुद अपने भोजन की व्यवस्था करता है और औरो के लिए भी करता है खुद खाता है औरो को भी खिलता है इसलिये शेर बन शेर लोमड़ी नहीं।

इस कहानी के माध्यम से बहुत सरल तरीके से समझाया गया हैं कि हमको शेर बनना चाहिए लोमड़ी नहीं। नाम के आगे सिंह लगाने से कुछ नहीं होता उस गुण को धारण करना पड़ता है।

इसलिये हमारे यहाँ नाम के आगे सिंह लिखा जाता हैं कई जगह सिंह लिखते है सियार नहीं, गीदड़ नहीं, लोमड़ी लिखते है? नहीं कोई नहीं लिखता है।

वास्तव में सिंह का गुण ही सर्वश्रेष्ठ गुण है हमारे यहाँ जानवरों से गुण की तुलना की गयी है जैसे मृग-नैनी, मृग-नैनी का मतलब जिसकी आँखें हिरन के समान सुंदर हों, बहुत सुंदर नेत्रों वाली स्त्री, हिरनी जैसी चाल, कोयल जैसी मिठी आवाज।

इंसान को परमात्मा ने ज्यादा महत्व दिया है कि वह शेर है जो अपने भोजन की व्यवस्था करेगा और दूसरों को भी करेगा देश की समस्याओं का समाधान शेर बनके ही किया जा सकता है देश को खुशहाल करने के लिए खुद ही आगे आना पड़ेगा,

शेर बनना बहुत मुश्किल है और गीदड़ कोई भी बन सकता है। अगर शेर बनते हैं तो जिम्मेदारियां उठानी पड़ती है खुद की, समाज की, देश की, धर्म की और लोमड़ी बनने पर जिम्मेदारियों से बचा जाता है ना धर्म से मतलब ना, देश से मतलब, ना क्रांतिकारियों के बलिदान से मतलब, ना खुद से मतलब सिर्फ अपना स्वार्थ देखा जाता है। हर कोई कहता है कि राजनीति भ्रष्ट है व्यवस्था खराब है, चाहते सब है कि यह सही होनी चाहिए लेकिन खुद आगे नहीं आना चाहते। नेताओं को गाली देने से या हाथ पर हाथ रखकर बैठने से देश मे सब ठीक नहीं होगा बल्कि हमें खुद से मेहनत करनी पड़ेगी।

आज हम ये सोचते हैं कि चंद्रशेखर आज़ाद आएं, भगत सिंह आएं क्योंकि हमें खुद कुछ नहीं करना उन्ही से ही कराना है लेकिन अब वे नहीं आएंगे अब तो हमें ही करना है इसलिये हमें शेर के गुण अपनाने पड़ेंगे हमें खुद ही करना पड़ेगा।

क्रांतिकारियों ने जितना दर्द हमारे लिए सहा इतना तो कोई कर भी नहीं सकता जितना वह हमारे लिए कर गए हैं अब हमारा कर्तव्य बनता है कि हम अपने देश के लिए खड़े हो, आगे आए ताकि खुद भी खुश हो सबके के लिए भी खुशहाली लाएं।

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