Khaalipaper.com

हिंदी कहानी संग्रह कथा स्टोरी | प्रेरणादायक हिंदी कहानी | Hindi story

Lifestyle

Kya tum insaan ho ya kathputli?

Kya tum insaan ho ya kathputli? – क्या आप अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीते है? या आप भी अपनी जिंदगी दुसरो के इशारे पर कठपुतली कि तरह जीते है? बात कडवी है, लेकिन सच है हम कैसे जियेंगे यह दुसरे लोग निर्धारित करते है। आप भी तो दुसरो कि नजरो में बेहतर बनने के लिए ही कर्म करते है।

हर वह कर्म करते है जिससे आप दुसरो कि नजरो में ऊपर उठ सके, और सामने वाला व्यक्ति कह सके कि आपके जैसा व्यक्ति मैंने आज तक नहीं देखा। आप बहुत अच्छे है। आप महान है। आप genius है। तुम अच्छे कर्म करो या बुरे कर्म करो सबकुछ दुसरो के लिए ही तो करते हो।

तुम अपने लिए जिए ही कब हो। कभी ध्यान दिया है कि तुम अपने लिए अपनी मर्ज़ी से कब जिए हो। पूरा जीवन तुम अपने लिए जीते ही नहीं हो, सब दुसरो के लिए तथा दुसरो को दिखाने के लिए जीते हो और कर्म भी दिखाने के लिए ही करते हो।

Kya tum insaan ho ya kathputli? – इसलिए तुम सब अपूर्णता में ही मरते हो। तुम्हे समझ में नहीं आता है, इतनी भाग दौड़ कर ये सब धन दौलत कमा कर पूरा जीवन धन इकठ्ठा करके, इतना मान सम्मान कमा कर, जो चाहिए था वह भी पाकर अंत में भिखारी ही रह जाते है।

कोई भी सम्राट नही हो पाता है। और इस सम्राट को पूरी दुनिया नहीं जितनी है। सिर्फ अपने आप को ही जितना है। जिसने अपने आप को जीत लिया वही इंसान एक महान सम्राट कहलायेगा।

तुम्हारी जिंदगी इस बात पर अटकी है कि लोग क्या कहेंगे? इसलिए हमेशा kathputli कि दुसरो के इशारो पर नाचते रहते हो। आप लोगो कि नज़र में बेहतर होना चाहते है। लेकिन आप कितना भी बेहतर हो जाये लोग तो कुछ न कुछ कहेंगे ही।

लोग कभी भी कहना बंद नहीं करेंगे। हर बात पर टिप्पणी करना तो लोगो कि आदत है। लोग तो भगवान को भी भला बुरा कहते है, तो आप क्या चीज है। लोग तो तथागत गौतम बुद्ध को भी भला बुरा कहते है। जबकि तथागत गौतम बुद्ध से पवित्र और सम्पूर्ण जीवन किसी का नहीं है।

इसलिए लोग क्या कहेंगे इस बात को अपने जीवन से निकाल कर बहार फेक दीजिये, और अपने आप को पहचानिए। बाहरी दुनिया ने आपको एक kathputli बना दिया है। एक रोबोट कि तरह बना दिया है हम भीड़ का हिस्सा होते जा रहे है। हम यह मानने लगे है कि जो भीड़ करती है, वह सही है। भीड़ जो बन रही है हमें भी वही बनना है।

हम अपने आप को इस भीड़ में भूल गए है। हम भीड़ हो गये है। हम कठपुतली हो गये है, इस भीड़ के हाथो कि, हमने जीना ही छोड़ दिया है। केवल भीड़ के पीछे भागना ही सिख रहे है।

Kya tum insaan ho ya kathputli? – कुछ ही लोग है इस दुनिया में जो वास्तव में अपना जीवन जी रहे है। और वह लोग, अन्य लोगो को भी जीवन जीना सिखा रहे है। लेकिन ऐसे लोग इस भीड़ को पागल नजर आते है। एक कहानी है कि एक सम्राट के यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ। एकलौता पुत्र था वह, उस बच्चे को कुछ भी पता नहीं था।

वैसे भी एक नवजात बच्चे को क्या पता होगा। लेकिन उसके पिता ने उस बच्चे के लिए पुरे जीवन के रूप रेखा खिंच डाली थी। पूरी प्लानिंग कर दी थी कि, वह क्या क्या करेगा और कैसे एक भावी सम्राट बनेगा।

लेकिन हम सब एक नेचर एक स्वभाव लेकर पैदा होते है। वही हमारे जीवन कि धारा होती है। जो एक नदी कि तरह साफ़ और स्वच्छ होती है। हमने उस धारा को खो दिया है। और अपना लिया है भीड़ तंत्र द्वारा दिया गया एक गन्दा नाला, क्योकि यह हमें ज्यादा सुरक्षित लगता है।

तुम इंसान नहीं कठपुतली हो!

कुछ खोजना कुछ जानना हमने बंद कर दिया है। उस बच्चे का भी एक नेचर था। उसे सम्राट नहीं बनना था। उस बच्चे का मन नाजुक था वह जल्द ही करुणा से भर जाता था। हिंसा में उसे आनंद नहीं आता था। उसे नृत्य करना पसंद था। उसे चित्र बनाना पसंद था। यही उसके जीवन कि धारा थी जिसपर अगर वह चलता तो वह सम्पूर्णता को प्राप्त करता।

लेकिन उसके पिता को यह पसंद नही था। वह अपने पुत्र से नाराज़ रहने लगा। उसने हर वह जतन किया जिससे वह अपने पुत्र में एक सम्राट के गुण डाल सके, लेकिन बच्चे पर कोई फर्क नही पड़  रहा था।

धीरे धीरे वह बछा बड़ा होने लगा। बच्चो कि ख़ास बात यह है कि दुनिया में क्या हो रहा है इस बात से उन्हें कोई मतलब नही होता है। वो जहां रहते है बस वही होते है। लेकिन अब वह बच्चा बड़ा हो रहा था। समाज से कुछ चीजे उसके अन्दर आ रही थी।

अब वह बाहर के बारे में भी सोचने लगा था। लेकिन नेचर तो उसका अब भी वही था पहले वाला। वह सम्राट अपने पुत्र से बहुत नाराज़ रहने लगा। वह सम्राट उसे बात बात पर ताने मारता। वह कहता कि तुम्हारे जैसा पुत्र होने से अच्छा होता कि मेरा कोई पुत्र ही नही होता।

लोग कितना हस्ते है मुझपर। तुम जानते हो वह कैसी कैसी बाते करते है मेरे बारे में। और यह सब तुम्हारे वजह से हो रहा है। पुत्र को पिता कि बाते लग गयी थी। उसने निश्चय किया कि वह केवल अपने पिता के लिए ही वह अपने आप से समझौता करेगा। और वह सारे कार्य करेगा जो उसके पिता चाहते है। एक बार पिता खुश हो जायेंगे तो वह अपना साधारण जीवन जियेगा।

वह एक ऐसा योद्धा बना जिसे हरा पाना नामुमकिन था। उसने कई लड़ाईया लड़ी और उनमे विजयी हुआ। हर बार उसे लगता कि उसके पिता उससे खुश हो जायेंगे। लेकिन हर बार उसके पिता सम्राट कहते कि अभी तुम्हे और सीखना है। अभी तुम पुरे नही हुए हो।

पिता कि नजरो में पूरा होने के लिए पुत्र ने अपनी पूरी ताकत लगा दी, लेकिन वह समय कभी आया ही नही। वह पुत्र भी अपने आप को भूल चूका था।  उसके अन्दर कि करुणा क्रूरता बन गयी थी।

हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही होता है। हम लोगो कि परवाह करते करते, जिम्मेदारियों को निभाते निभाते, हम अपने आप को भूल ही जाते है। और एक ऐसी जिंदगी को अपना लेते है जो हमारी कभी हो ही नहीं सकती। खुशकिश्मत है वह लोग जो वही जीवन जीते है जो वह है। वह खुलकर इस जीवन का आनंद लेते है।

एक दिन उस युवराज कि नज़र गाव कि एक युवती पर पड़ी, उसे देखते ही युवराज के मन में उसके लिए प्रेम उमड़ आया। उसने उस युवती को अपने राजमहल में बुलवाया और उस युवती के सामने हीरे जवाहरात के एक से एक ढेर लगा दिए।

और फिर उस युवती से कहा कि मै तुमसे प्रेम करता हुं। यह सब तुम्हारे लिए है। सब एक से एक कीमती है। तुम मेरे प्रेम को स्वीकार कर लो। युवती ने कहा तुम मुझसे प्रेम नहीं करते हो तभी तो यह कंकड़ पत्थर मुझे दिखा रहे हो। अगर प्रेम करते हो तो मुझे तुम्हारी सबसे कीमती चीज चाहिए।

क्या दे सकोगे? युवराज ने कहा जो चाहे मांग लो सब तुम्हारा ही तो है। युवती ने कहा यह सब मुझे नहीं चाहिए। क्या तुम एक साधारण युवक कि तरह चल सकोगे? छोड़ सकोगे अपना पद, अपना राज्य, यह धन दौलत और अपना राजमहल। हमारी जिंदगी में भी कुछ ऐसा ही है।

धन दौलत, मान सम्मान, पद प्रतिष्ठा ही प्रेम कि कसौटी बन जाता है। आपने देखा है न कि जिसके पास जितनी ज्यादा धन दौलत, पद प्रतिष्ठा होती है, लोग उससे अधिक प्रेम करते है। उसकी फ़िक्र करते है। हमेशा उसके साथ खड़े रहते है।

यह अलग बात है, यह सब झूठा है। और केवल दिखावा होता है। और हम सब इसी झूठ और दिखावे को पाने के लिए अंतिम सास तक दौड़ते रहते है। भागते रहते है। गरीब से न तो कोई प्रेम करता है और न हि कोई उसकी फ़िक्र करता है। और न ही कोई उसके साथ खड़े रहने के लिए तैयार रहता है। लेकिन वह भी तो यह सब चाहता ही है।

झूठा प्रेम लालच से जुड़ा होता है। लेकिन शायद वह युवराज उस युवती से सच्चा प्रेम करता था। इसलिए उसने उस युवती से कहा कि, मै तुम्हारे साथ एक साधारण जीवन जीने के लिए तैयार हुं। बस मै अपने पिता को यह सुचना देकर आता हुं। जैसे ही पिता को पता चला कि उसका पुत्र राज्य छोड़कर जाने वाला है और वह भी एक साधारण सी लड़की के लिए।

पिता ने जासूसी के आरोप में उस लड़की को मृत्युदंड दे दिया। जब हमारे हाथो में अधिकार होते है, शक्ति होती है तब हम न्याय और अन्याय का फर्क भूलने लगते है। हम अपने आप को सर्वशक्तिमान समझने लगते है।

शक्तिहीन गरीबो कि जन्दगी हमारे लिए कोई मायने नही रखती है। मायने रखता है तो बस अपनी स्वार्थ सिद्धि को पूरा करना। एक मौका मिलता है हमें सेवा करने का और हम उसे भी खो देते है। और जब इन कर्मो का फल वापस हमें मिलता है तब हम बड़े भोले बनकर कहते है कि मेरा क्या दोष है? मै ही क्यू?

युवराज को जब यह पता चला तो वह अपने सम्राट पिता के पास गया, उसने अपने पिता को समझाया लेकिन पिता नहीं समझे। तब उसने अपने पिता से विनती कि, कि वह उस युवती को छोड़ दे उसके बदले में वह जो भी कहेंगे वह जीवन भर उसका पालन करेगा।

पिता इस बात से खुश हो गये और उस युवती को छोड़ दिया। पिता ने युवराज का विवाह एक राजकुमारी के साथ कर दिया। वह राजकुमारी बहुत ही महत्वकांक्षी थी। वह जल्द से जल्द महारानी बन जाना चाहती थी। इसके लिए युवराज का सम्राट बनना आवश्यक था। पति पत्नी के जीवन में अगर प्रेम कि जगह महत्वकांक्षा लेले तब उनके जीवन में दुःख के शिवाय कुछ भी उत्पन्न नहीं होने वाला है।

और आजकल तो पति पत्नी दोनों ही महत्वकांक्षी है। प्रेम के लिए इनके जीवन में जगह ही नहीं बचती है। और जिसे वह प्रेम समझते है वह लालच पर टिका हुआ सवार्थ ही होता है।

राजकुमारी राजकुमार से कहती है कि सम्राट अब बूढ़े हो चुके है। तुम्हे अब उनकी जगह ले लेनी चाहिए। अब वह राज काज ठीक से चलने के काबिल नहीं रहे। बुढापे में अक्सर ऐसा होता है कि सब लोग आपको छोड़ने लगते है। आप बोझ बन जाते है।

और वह प्रेम जो स्वार्थ पर टिका हुआ था वह गिर जाता है। आप अकेले रह जाते है। लेकिन सभी के साथ ऐसा नहीं होता है। कुछ को तो बुढापे में और अधिक प्रेम कि प्राप्ति होती है।

उनके बच्चे उनकी सेवा बिना किसी स्वार्थ के करते है। और इसका कारण केवल इतना है कि उन माता पिता ने अपने प्रेम में स्वार्थ कि मिलावट नहीं कि थी।

राजकुमार को राजकुमारी कि बाते सही लगने लगी थी। राजकुमार को पता ही नहीं था कि वह अपने पिता से नाराज़ रहने लगा था। बचपन से वह अपने पिता से नाराज़ चल रहा था। इसी नाराजगी के कारण अपने अंतर में अपने पिता के लिए वह क्रोध को पालता रहा।

वह अपने पिता के पास गया और उनसे कहा कि आप अब बूढ़े हो चुके है आपको अब आराम करना चाहिए। आपको मुझे सम्राट घोषित कर देना चाहिए।

इसे अब मै संभल लूँगा। सम्राट पिता ने कहा अभी तुम इस काबिल नही हुए हो। पहले काबिल बन जाओ तब मै स्वयं तुम्हे सम्राट घोषित कर दूंगा।

चीजे बदलती चली गयी और धीरे धीरे वह राजकुमार अपने पिता का दुश्मन बन गया। राजकुमारी ने राजकुमार को पिता को रास्ते से हटाने का एक उपाय बताया। उस समय युद्ध चल रहा था। पिता को वीरगति को प्राप्त कराने का सारा प्रयास था।

पिता को युद्ध के दौरान अकेले कर पीछे से मारने का षड्यंत्र रचा गया था। लेकिन युद्ध में युवराज दुश्मन के बिच अकेला फास गया। पिता ने यह देखा तो वह घोड़े पर सवार होकर पुत्र कि ओर दौड़ा।

पुत्र ने सोचा कि अच्छा मौका है वह तलवार लेकर पिता कि ओर बढ़ा लेकिन तभी किसी ने पुत्र पर भाले से प्रहार किया और पिता सम्राट ने पुत्र को बचाने के लिए अपने आप को उस भाले  के आगे कर दिया। सम्राट जमीन पर गिर गया। यह देख कर युवराज के हाथो से तलवार छुट गयी। वह अपने पिता को घोड़े पर लादकर वह से निकल आया।

रास्ते में पिता ने पुत्र से कहा, तुम अब काबिल हो गये हो मै तुम्हे सम्राट घोषित करता हुं। जाओ और अपने राज्य को बचा लो यह कहकर सम्राट वीरगति को प्राप्त हो गया। युवराज का क्रोध करुणा में बदल गया।

उसे महसूस हुआ कि वह अपने पिता से प्रेम करता है। नफरत नहीं। उसे अपने आप से आत्मग्लानी होने लगी। उसने वह युद्ध तो जीत लिया लेकिन अपने आप को हर गया।

हमारे आस पास ऐसे बहुत से लोग होते है जिनकी बाते हमें अच्छी नहीं लगती। वे हमेशा कडवी बात ही करते है। और वह हर बात जो हमें सच का आइना दिखाती हो वह कड़वी लगती है। हम ऐसे लोगो को ढूंढते है जो हमारी हा में हा मिलाते रहे। हम गलत है तो भी हमें यह न बताये कि हम गलत है।

लोग हमें बहका सकते है क्योकि हम पहले से ही बहकने के लिए तैयार बैठे है। हम जो कर रहे है वह सही है, हमें बस ऐसा कहने वाले लोग पसंद आते है।

राजकुमार ने अपनी पत्नी को षड्यंत्र रचने के जुर्म में कारावास में डलवा दिया। वह स्वयं को भी सजा देना चाहता था। सम्राट बने रहने में अब उसकी कोई इच्छा नहीं थी। एक दिन वह अकेले अपने अपने राज्य के भ्रमण पर निकला।

रास्ते में उसने एक व्यक्ति को मस्त होकर नाचते गाते देखा। वह उस व्यक्ति के पास गया और पूछा कौन हो तुम? उस व्यक्ति ने कहा कौन हुं मै यही तो मुझे नहीं पता कि मै कौन हुं? यही तो मै जानना चाहता हु कि मै कौन हु? क्या तुम जानते हो कि तुम कौन हो? युवराज ने कहा कि मै यहाँ का सम्राट हुं।

व्यक्ति ने कहा मुझे भी यही लगता था कि मै यहाँ का सम्राट हुं, लेकिन बाद में पता चला कि मुझसे बड़ा भिखारी कोई नही है। युवराज ने कहा तुम समझ नहीं रहे हो मै वास्तव में यहाँ का सम्राट हुं। उस व्यक्ति ने कहा मै जनता हु कि तुम यहाँ के सम्राट हो। कभी मै भी यहाँ का सम्राट ही था।

मैंने ही यह राज्य तुम्हारे पिता को अपने हाथो से सौपा था। तुम्हारे पिता मेरे सेनापति हुआ करते थे। और तू यह भी नही जानते होगे कि जिस लड़की को जासूसी के लिए तुम्हारे पिता ने मृत्युदंड दिया था वह मेरी ही पुत्री है।

युवराज उस व्यक्ति के चरणों में गिर गया, और कहा मैंने अपने पिता से आपके बारे में सुना था। आप ही मुझे बताये कि मुझे क्या करना चाहिए? मै सम्राट नहीं बनना चाहता। वह व्यक्ति सम्राट को अपने साथ एक जगह पर ले गया और कहा देखो सामने उस विशाल वृक्ष को देखो। इस वृक्ष कि तरह सम्राट बनो। इस वृक्ष पर कई तरह के प्राणी बसते हैं।

यह सब इस वृक्ष कि प्रजा है। और यह सबका ख्याल रखता है। सबकी रक्षा करता है। सबको भोजन देता है। हम जैसे पापी इंसानों को भी छाव, लकड़ीऔर भोजन  देता है।

और देखो तो जरा इसमें जरा सा भी अहंकार नहीं है। यही असली सम्राट है। लोगो को सताना, जमीन छीन लेना, युद्ध में रक्त बहाना यह असली सम्राट का कार्य नही है। जाओ और जाकर अपनी प्रजा कि सेवा और रक्षा ऐसे करो जैसे यह वृक्ष करता है।

तब तुम महान सम्राट बनोगे। अपने लिए जिए लोगो को दिखने के लिए नहीं। अपने आप को पहचाने, जिसमे ख़ुशी मिलती है वही कार्य करो। हम सब भटक गये है। और काल्पनिक दुनिया में जी रहे है। जहा हर कोई हर किसी को बांधकर घसीट रहा है। ध्यान से देखोगे तो पता चलेगा। हमारे विचार हमारे नहीं है।

Kya tum insaan ho ya kathputli? – हमारी सोच भी हमारी नहीं है। हम हिन्दू परिवार में पैदा हुए तो हिन्दू हो जाते है। मुस्लिम परिवार में पैदा हुए तो मुस्लिम हो जाते है। सिख परिवार में पैदा हुए तो सिख हो जाते है। इसाई परिवार में पैदा हुए तो इसाई हो जाते है।

कभी सोचा है कि कौन है जो हमें यह सब बना रहा है? अन्दर से तो हम सब एक ही है। एक काल्पनिक व्यवस्था लागु कर दी गयी है। जो हमें यह बताती है कि हम इस धर्म इस जाती के है और हमें दुसरे धर्म और जाती के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए।

विश्वास करना यह सत्य है कि भगवन ने धर्म या जाती नहीं बनाई है। हम सब दिखावे के लिए जी रहे है। बस इसलिए हम भीड़ हो गये है। जो भीड़ को मंजूर है वही सही है। वह अकेला हो जाता है जो स्वयं को जानने के लिए निकलता है।

और उससे भी लोग पूछते है कि किस धर्म किस जाती से हो और तब वह यदि हस दे तो कहते है कि पागल है। उस राजकुमार को तो यह बात समझ में आ गयी और वह अपने नेचर में वापस आ गया जहा करुणा और प्रेम था।   


ऐसे ही आर्टिकल के लिए हमारे Facebook पेज को फॉलो करें।