“अच्छा पड़ोसी” - अच्छा पड़ोसी सभी को चाहिए

8 October, 2020
Achha padosi

जी हाँ अच्छा, बुद्धू और दब्बू पडोसी सभी को चाहिए।

मेरे सब पडोसी कहते है कि उनका पड़ोस बहुत अच्छा है। यह बात सुन सुनकर मेरे कान में आग लग जाती है। मै चाहता हूँ कि वे लोग आगे से मेरे पड़ोस का नाम न ले। पर क्या करे हर आदमी कि कुछ विशेषता होती है, मेरी भी है। तभी कोई न कोई आकर जले पर नमक छिड़क जाता है - तुम्हारा पडोसी अपने पड़ोस कि बहुत तारीफ कर रहा था। भाई क्यों नहीं करेगा तारीफ बुद्धू और दब्बू पडोसी सब चाहते है।

परसों कि बात है शर्मा जी का नौकर मेरी खाट वापस कर गया। एक साल में दो महीने और चार दिन बाद वह भी इसलिए क्योकि उसमे जान ही नहीं बची थी। उसके सारे सुटली की रस्सी गायब थी उसके सारे जोड़ भी ढीले पड़ गये थे। शर्मा जी के घर पिछले साल जब मेहमान आये थे तब वे मेरी खाट ले गये थे। उस समय पत्नी ने कहा टूटी खाट दे दो। पर मै गुस्सा हो गया था कि शर्मा जी के मेहमान क्या कहेंगे। सबसे अच्छी खाट दे दिया। वह खाट अखबार के विज्ञापनों में इस्तेमाल से पहले का चित्र थी और जो परसों लौटकर आई वह खाट इस्तेमाल के बाद कि प्रतिरूप थी। मैंने दबी जुबान से पूछा भी – भाई इसकी रस्सी कहा गयी?

शर्मा जी ने कहा घर में पुछ के बताता हूँ। मेरे पड़ोसी भी इतने भले है कि उसी समय अपने छोटे से बेटे से जवाब भिजवा दिया – उनकी कपडे सुखाने कि रस्सी टूट गयी थी तो उनकी खाट कि रस्सी ने उनकी कपडे सुखाने में ब हूँत सहायता कि। एक दो दिन में बाज़ार से नयी रस्सी लायेंगे तब उनके खाट कि रस्सी वापस कर देंगे।

बगल के गुप्ता जी को अख़बार पढने का शौक है। वे यह कहते है कि मेरे यहाँ स्टेटमैंन आता है और तम्हारे यहाँ हिंदुस्तान टाइम्स आता है। मै जानता हूँ कि ये अखबार वाले बड़ी पेपर कि उड़ाते है, परन्तु दोनों को एक साथ पढ़कर में सच को ढूंढ निकालता हूँ। वैसे मै जानता हूँ कि वे भी पेपर कि उड़ा रहे है, उनके घर कोई अखबार नहीं आता है। वे समय के इतने पाबंद है कि अख़बार आने के पुरे दो मिनट के बाद उनकी आवाज़ आती है – क्यों भाई अखबार आ गया क्या ? अखबार उड़ जाता है और शाम को मेरे दफ्तर से लौटने के बाद ही वह लौटता है। मै यही सोचकर दिल को मना लेता हूँ कि ब हूँत सी ऐसी जगह है जहा अखबार अगले दिन पहुंचते है और वहा के रहने वालो को एक दिन बासी खबरे पढने को मिलती है।

मै आपको एक भेद कि बात बताता हूँ, कही मेरे पड़ोसियों को न बता दीजिये। मेरी जितनी किताबे है सब पर मेरे दोस्तों का नाम लिखा है। इसका राज यह है कि किताबे खरीदकर मै लाता हूँ और पढता सारा मोहल्ला है। कई बार यह सोचा कि यह शौक छोड़ दू लेकिन जिसकी आदत हो पड गयी है वह आदत कैसे छुट सकती है। पहले किताबे पड़ोस में मांगी जाती थी और वही पड़ी रह जाती थी। इस समस्या से बचने के लिए मैंने यह तरकीब लगाई है कि किताब खरीदते ही उसपर किसी दुसरे का नाम लिख देता हूँ, जिससे पडोसी लोग वापस कर देते है और यदि वापस नहीं भी कर रहे हो तो मै उनपर जोर डाल सकता हूँ – भाई दुसरे कि किताब है, वह मेरी जान खा रहा है। जिस दिन से यह युक्ति भिड़ाई है मेरी अस्सी प्रतिशत पुस्तके मुझे वापस मिल गई है।

चाय, चीनी मांगकर ले जाना न मालुम के बराबर हो गया है पर मेरी तो बाल्टी और कढाई भी मांग कर ले जाते है। रोजमर्रा कि चीज देने का एक नुक्सान यह भी है कि उन्हें लौटाने कोई नहीं आता है। मुझे ही उनके घर पांच, छह चक्कर लगाने पड़ते है। बाल्टी का उदहारण ले लीजिये। बाबु रामकृष्ण मांग कर ले गये थे। पहली बार वापिस लेने गया तो दरवाजे पर घुसते ही पता चला कि वे घर पर नहीं है, अगली बार वे नहा रहे थे। मै पंद्रह मिनट बैठा रहा, लेकिन उनकी पत्नी ने कहा कि वे नहाते ही पूजाघर में चले जाते है और एक घंटे के बाद ही निकलते है। भाई अपनी बाल्टी लेनी थी इसलिए मै भी ताक में लगा रहा लेकिन बाल्टी नहीं मिली।

एक दिन मैंने उन्हें गली में घुसते देखा और झटपट निचे उतारकर उन्हें अपनी बैठक में सायकल रखते हुए पकड़ लिया। मुझे देखकर वे खिझाई हसी हसे और खुद ब खुद उन्हें बाल्टी याद आ गयी। घर में आवाज़ देकर बोले कि अरुण जी की बाल्टी दे दो। उनका बेटा बाहर निकला और बोला मम्मी कह रही है कि बाल्टी में तेल लगा हुआ है हम शाम को साफ़ करके दे देंगे। मै शिष्टाचार में मुस्कुराया और कहा – भाई जरुरी काम है, दे दो मै खुद ही साफ़ कर लूँगा। उन्होंने अपने बेटे को धुडका, जा ऐसी ही लेकर आ उनकी बाल्टी है बेचारे तंग हो रहे है। तुम लोगो को चीज मांगनी तो याद रहती है... अपनी डांट को अधुरा छोड़कर वो मेरी ओर मुड़े और कहा अरुण जी मै रोजाना वापिस करने कि सोच रहा था, लेकिन काम नहीं निपटा था और सच्ची बात यह है कि काम अभी निपटा कहा है।

गरज यह है कि बाल्टी वापिस आ गयी जो बिल्कुल साफ थी और वापिस लेकर जाते समय उनकी बातो ने मुझे यह अनुभव करा दिया कि केवल दस दिन में बाल्टी वापिस लेते हुए मै उनपर बड़ा अन्याय कर रहा हूँ।

छोटी चीजो को मारिये गोली मोटी चीज लीजिये। पिछले साल मेरे घर पर पुताई चल रही थी। एक दिन सवेरे दस बजे मुझे घर के पडोसी भटनागर साहब कि आवाज़ आई। अरुण जी आपके यहाँ सीढि है? मैंने बगल में झाँका वे बड़े शान्ति से मेरे राज को सीढि पर चढ़े पुताई करते देख आहे थे। मै बोला जी हा सीढि है। भटनागर साहब बोले जरा भेज दीजिये मेरे यहाँ पानी का पम्प भर गया है, उसे ठीक करने मिस्त्री आया है काम होते ही लौटा दूंगा। मैंने भी जवाब दिया कि मैंने भी आज के लिए मंगवाई है। शाम को राज के जाने के बाद आप ले लीजियेगा। कल सुबह मुझे वापिस भेजनी है। ऊपर कि पुताई निपटी नहीं तो दिक्कत हो जाएगी। वे हस पड़े और बोले आप भी कमाल करते है आज कल मिस्त्री को लेकर आना आसान काम नहीं है, दस दिन से चक्कर लगा रहा हूँ तब जाकर आज मिस्त्री मिला है। पंद्रह बीस मिनट लगेंगे।

मैंने हार मान ली और कहा अच्छा मंगवा लीजिये। मंगवाऊ किससे! आप ही जरा मेहरबानी करके अपने राज के साथ भेज दीजिये। तब का गया हुआ राज पुरे तिन घंटे बाद वापिस लौट कर आया। पूछने पर पता चला कि उसे सीढि पकड़ने के लिए कहा गया था, कही सीढि गिर न जाए इसलिए। दूसरी बार मै इससे भी अच्छा पडोसी सिद्ध हुआ। राज पुताई कर रहा था इस बार शर्मा जी पधारे। आपके घर राज काम चल रहा है क्या? मैंने कहा जी हा। शर्मा जी बोले आज उसे मेरे घर भेज दीजिये एक दो छेद बंद करवाने है, चूहों ने तंग कर दिया है मरम्मत करवानी है।

मैंने अच्छा पडोसी होने के नाते राज को आते ही शर्मा जी के घर भेज दिया। पांच मिनट बाद शर्मा जी पधारे और बोले भाई साहब आपके यहाँ सीमेंट होगा क्या? सीमेंट का नाम सुनकर मै घबरा गया। दस दिन खड़े होने के बाद सीमेंट कि बोरी मिली थी। शर्मा जी बोले आप चिंता न करे, मेरे साढू का भतीजा सप्लाय में है। बस एक तसला दे दीजिये मेरा आज का काम चल जाएगा। एक दो दिन में मै आपको बोरी ला दूंगा।

मन मारकर हां करनी पड़ी। एक तसला करके मेरी एक बोरी खाली हो गयी। मुझे वही चुटकुला याद आ गया। आपके पास माचिस होगी? और माचिस लेने के बाद, फिर तो सिगरेट भी होनी चाहिए?

एक बोरी सीमेंट और आज कि दो दिन कि मजदूरी खोकर मुझे अच्छा पडोसी बनने से कोई नहीं रोक सकता है। बस पड़ोसियों को कुछ डर है तो वह भी मेरी पत्नी से किन्तु वह भी बचपन से पड़ी बुरी भली आदतों से कहा तक कंट्रोल कर सकती है।

सारा पड़ोस कहता है कि अच्छा पडोसी हूँ और मै और मेरी पत्नी जल भुनकर रह जाते है।

- RAKESH PAL