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उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी के मुख्य कारण क्या है?

Uttar pradesh mein berozagaaree ke kaaran – हालांकि उत्तर प्रदेश में बेरोज़गारी तो कई वर्षो पहले से ही चली आ रही हैं। इसका मुख्य कारण है की वहा रोजगार के उचित साधन की व्यवस्था की कमी माना जाता है जैसे कारखानों की कमी, उचित शिक्षा की कमी, धन का अभाव, पिछड़ा वर्ग की अधिक जनसंख्या आदि।

उत्तर प्रदेश में अधिकतर खेती की जाती थी लोग कृषि और कृषि ब्यावसाय से जुड़े हुए थे। यहाँ की जलवायु कृषि के लिए उप्युक्त थी। यहां के लोगो की जीविका खेती से हो जाया करती थी जिनके पास खेत हुआ करते थे, और बाकि के कुछ लोग उनके खेतों में मजदूरी कर के अपनी जीविका चला लिया करते थे। कुछ लोग सरकारी विभागों में भी थे जिन्हें नौकरी मिल जाती, कुछ लोग सरकारी स्कूलों में पढ़ाते थे। सब्ज़ी बेचना, मजदूरी करना, छोटी मोटी दुकान चलना ज्यादातर लोगो का इसी से गुजारा हो जाया करता था।

जनसंख्या वृद्धि बेरोजगारी का मुख्य कारण हैं।

Uttar Pradesh परमारिक खेती और सामाजिक खेती के लिए जाना जाता था। यहाँ पे खेती मिलजुल कर की जाती थी। गॉव के लोग एक दूसरे की खेती में सहयता करते थे। लोगों की खेती बिना गॉव के लोगो की मद्दद के बिना नहीं हो सकती थी। जैसे धान की खेती जब शुरू करनी होती थी तो सब लोग मिलकर एक किसान या परिवार की मद्दद करते थे और फिर दूसरे परिवार की खेती में, यह चक्र सामान रूप से हर साल चलता रहता, गन्ने की खेती में भी सब लोग मिल कर गन्ने को बोया करते और शाम को सब लोग साथ में मिलकर खाना भी कहते और जब गन्ने की फ़सल तैयार हो जाया करती थी तब सब लोग मिलकर ही गन्ने की छुलाई, ढोवाई और बैलो द्वारा पेराई करते और गन्ने का रस, गुड़ भी ले जाया करते जिस से उन्हें भी रस, गुड़ खाने के लिए मिल जाया करती थी।

इसी तरह से बहोत सारी फसलों की कटाई बुवाई, ढोवाई हुआ करती और लोगो को कुछ अनाज मिल जाया करता। लोग कुछ न कुछ करके अनाज जमा ही कर लिए करते थे जिस से अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर लिया करते। इसे सिलसिला कहें या परंपरा कई वर्षों तक यूं ही चला आ रहा था।

पर बीते कुछ वर्षो से यह चक्र बिगड़ता चला गया अब बेरोज़गारी बढ़ती ही जा रही है लोग मजदूरी के मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों की ओर बढ़ते चले जा रहे है जैसे जैसे वहाँ की जनसँख्या में वृद्धि होती गयी वैसे वैसे खेत खलियान कम होते गए। जिन खेतों में पहले फसले हुआ करती थी अब वहा घर और माकन बनते जा रहे है।

अब परमारिक खेती और सामाजिक खेती लुप्त होती जा रही है लोगों का रुझान खेती से अब काम होता जा रहा है और लोग अब शहरों की तरफ रूख कर रहे है। इसके कई कारण है कुछ लोगो के पास तो अपनी ज़मीन ही नहीं हुआ करती थी और कुछ लोगों की ज़मीन शादी विवाह, किसी बिमारी और बच्चों की पढ़ाई में ही बीक जाया करती और कुछ लोगों की तो वहा के बदमाश हड़प लिया करते है। धीरे धीरे लोगों में एक दुसरे के प्रति जलन की भावना, पर्तिस्पर्धा बढ़ती गयी और इसी के चलते सामाजिक परिवार बिखरते चले गए और लोग एक दुसरे की सहायता भी करना कम कर दिए, लोगों ने जातिवाद को भी बढ़ावा दे दिए।

जिस तरह से पृथ्वी पर प्रदूषण बढ़ता गया उसी तरह से पर्यावरण खेती के अअनुकूल होती चली गयी कभी बाढ़ कभी सुखा कभी बीन मौसम बरसात जिस से पैदवार में कमी होने लगी और खाने वालो की जनसंख्या बढ़ती चली गयी।

और रही सही जो भी कसर थी वह वहा के प्रधान, जिला अधिकारी, प्रशासन, नेता-मंत्री और सरकार ने पुरी कर दी अपनी आँखे बंद कर के। वहा की सरकार ने कभी ना उद्योग पे धयान दिया ना ही शिक्षा पे बस वे आपस में लोगों को जातिवादि में उलझाए रखा।

पहले लोग आत्मनिर्भर थे अपनी जीविका के साधन खुद ही कर लेते थे, अपने परिवार की जिम्मेदारी खुद ही उठा लिया करते थे उन्हें किसी और पे निर्भर नहीं होना पढ़ता था पर अब लोग नौकरी पर निर्भर होना शुरू कर दिये जिस से लोगों में बेरोज़गारी बढ़ने लगी।


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