क्या सचमुच आज़ाद हुए है हम?

आज़ादी है खुलकर जीना और सबको चैन से जीने देना।

कही पर जश्न मनाये जा रहे है कही पर खुशिया मनाई जा रही है कही आग लगाई जा रही है। देश में आक्रोश है तब मन में आंधी चलती है तूफ़ान उठते है और प्रश्न उठता मन में है कि क्या सचमुच आज़ाद हुए है हम?

पहले भी बहुत दुःख और दर्द थे जीवन में लेकिन सबकुछ व्यापार नहीं था। संबंधो में अपमान था लेकिन रिश्तो का बाज़ार नहीं था। खेतो में खुशबु बसती थी, सावन के झूले पड़ते थे। अब कागज़ के फूल सज़ाकर उन मीठे गीतों को भी भूल गए। कवी तुलसीदास कि चौपाई जब उल्टी धुन के इंधन में जलती है तब आंधी चलती है चिंतन में और प्रश्न उठता है मन में कि क्या सचमुच में आज़ाद हुए है हम?

माना कि बाबूजी अनपढ़ थे, माँ उपवास करती थी, भाई बहन कि अपनी मज़बूरी थी। भाभी जी कि अपनी मज़बूरी थी, साज सज्जा के सामान नहीं थे, दिखावे का जमाना नहीं था न ही दिखावा करने कि रेस लगी थी। खुशिया तब अपनों के लिए खोने में थी ज्यादा पाने कि चाहत नहीं थी। तब घर टुटा लगता था लेकिन अब आँगन बड़े बड़े हो गये है लेकिन उस आँगन में सूनापन दीखता है। तब आंधी चलती है चिंतन में और प्रश्न उठता है मन में क्या सचमुच आज़ाद हुए है हम?

केवल सत्ता का परिवर्तन होना ही आज़ादी अर्थ नहीं है और आज़ादी का मतलब यह भी नहीं है कि सत्ता में सिर्फ कुछ ख़ास चुने हुए लोग ही रहे। आज़ादी का मतलब यह भी नहीं है कि सब के सब धनि ही हो जायेंगे। लेकिन जब ऊँची कुर्सी के आगे न्याय के लिए भीख मांगनी पड़ती है तब आंधी चलती है चिंतन में और प्रश्न उठता है मन में क्या सचमुच में आजाद हुए है हम?

आज़ादी है खुलकर जीना और सबको चैन से जीने देना। आज़ादी है खुली हवा के झोको कि तरह जो सबको छू जाये, आज़ादी है ओस कि बूंदों कि तरह जो हर पत्ते पर चू जाए। आज़ादी इन्द्रधनुष के रंगों कि तरह होनी चाहिए जो सबसे एक प्रकार मिल जुलकर रहे। आज़ादी एक झरने कि तरह होनी चाहिए जो सबके लिए निरंतर एक तरह से बहती रहे। लेकिन आज़ादी जब सिर्फ कुछ खास चुनिन्दा लोगो को ही मिले तब वो आज़ादी नहीं। तब आंधी चलती है चिंतन में और प्रश्न उठता है मन में क्या सचमुच में आजाद हुए है हम?

सही मायने में इस देश में सबको आज़ादी कब मिलेगी इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। मनुष्य के लालच कि कोई सीमा नहीं है। जिस दिन मनुष्य संतोष करना सिख जाए उस दिन से सही मायने में आज़ादी का अनुभव सुरु होगा लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं है। मनुष्य के इच्छाओ का कोई अंत नहीं है वह निरंतर बढती रहती है। इसलिए आज़ादी मुश्किल है।

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