“क्रोध” यह एक भयंकर विषधर सर्प के समान है।

क्रोध का मुख्य कारण अहंकार है यह एक क्षणिक पागलपन है।

सामाजिक जीवन में क्रोध कि जरुरत बराबर पड़ती है। यदि क्रोध न हो तो मनुष्य दुसरो के द्वारा पहुचाये जाने वाले कष्टों का उपाय ही नहीं कर पायेगा। कोई मनुष्य किसी दुष्ट के नित्य दो चार प्रहार सहता है यदि उसमे क्रोध का विकास नहीं हुआ तो वह केवल आह – उह करेगा जिसका उस दुष्ट पर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

उस दुष्ट के ह्रदय में विवेक, दया आदि उत्पन्न करने में बहुत समय लग जायेगा। संसार किसी को छोटे कामो के लिए इतना समय नहीं दे सकता। भयभीत होकर प्राणी अपनी रक्षा कभी कभी कर लेता है। पर समाज ने इस प्रकार कि प्राप्त दुख निव्रत्ती स्थायी नहीं होती है।

हमारे कहने का अभिप्राय यह नहीं है कि क्रोध करने वाले के मन में सदा भावी कष्ट से बचने का उद्देश्य रहा करता है। कहने का तात्पर्य केवल इतना है कि चेतना सृष्टि के भीतर क्रोध का विधान इसलिए है। जिससे एक बार दुःख पंहुचा पर उसे दुहराए जाने कि सम्भावना कुछ भी नहीं है। जो कष्ट पहुचाया जाता है वह प्रतिकार मात्र है उसमे रक्षा कि भावना कुछ भी नहीं रहती है। अधिकतर क्रोध इसी रूप में देखा जाता है।

हमारा पडोसी कई दिनों तक नित्य आकार हमें दो चार टेढ़ी मेढ़ी बाते सुना जाता है। यदि हम उसे एक दिन पकड़कर पिट दे तो हमारा यह कर्म शुद्ध पर्तिकर न कहलायेगा क्योकि हमारी दृष्टी नित्य गलियां सहने के दुःख से बचने के परिणाम कि ओर भी समझी जाएँगी। इन दोनों दृष्टान्तो को ध्यान पूर्वक देखने से पता लगेगा कि दुःख से उद्विग्न होकर दुखदाता को कष्ट पहुचाने कि प्रवृत्ति दोनों में है। पर एक में वह परिणाम आदि का विचार बिलकुल भी छोड़े हुए है और दुसरे में कुछ लिए हुए।

इनमे से पहले दृष्टान्त का क्रोध उपयोगी दिखाई नहीं पड़ता। पर क्रोध करने वाले के पक्ष में उसका उपयोग चाहे न हो पर लोक के भीतर वह बिलकुल खाली नहीं जाता। दुःख पहुचाने वाले से हमें फिर से दुःख पहुचने का डर न सही पर समाज को तो है। उसे उचित दंड देने से पहले तो उसी कि शिक्षा या भलाई हो जाती है, फिर सम्माज़ के और लोगो के बचाव का बिज भी बो दिया जाता है।

यहाँ पर भी वाही बात लोगो के मन में लोककल्यान कि यह व्यापक भावना सदा नहीं रहा करती है। अधिकतर तो क्रोध प्रतिकार के रूप में ही होता है। बहुत से स्थलों पर क्रोध पर क्रोध किसी का घमंड चूर करना मात्र होता है। अर्थात दुःख का विषय अहंकार होता है।

क्रोध का वेग इतना प्रबल होता है कि कभी कभी मनुष्य यह भी विचार नहीं करता कि जिसने दुःख पहुचाया है उसमे उसमे दुःख पहुचाने कि इच्छा थी या नहीं। क्रोध शान्ति को भंग करने वाला मनोविकार है। एक क्रोध दुसरे में भी क्रोध का संचार करता है। जिसके प्रति क्रोध का प्रदर्शन होता है वह तत्काल अपमान का अनुभव करता है और इस दुःख पर उसकी भी निगाह चढ़ जाती है।

यह विचार करने वाले अभूत कम निकलते है कि हम पर जो क्रोध प्रकट किया जा रहा है वह उचित है या अनुचित| इसी से धर्म निति और शिष्टाचार तीनो में क्रोध के निरोध का उपदेश पाया जाता है। संत लोग तो खालो के वचन सहते ही है, दुनियादार लोग भी न जाने कितनी उची नीची पचाते रहते है। सभ्यता के व्यवहार में भी क्रोध के चिन्ह बदाये जाते है। इस प्रकार का प्रतिबन्ध समाज कि सुख शांति के लिए बहुत आवश्यक है।

क्रोध का एक हल्का रूप है चिडचिडाहट जों शब्दों तक ही रहती है। इसका कारण भी वैसा उग्र नहीं होता। कभी कभी कोई बात ठीक न लगने के कारण ही लोग चिडचिडा उठते है। चिडचिडाहट एक प्रकार कि मानसिक दुर्बलता भी है। यह रोगियों और बुजुर्गो में अधिक पायी जाती है। इसका स्वरूप उग्र न होने से यह बालको वे विनोद कि एक सामग्री भी हो जाती है।

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