कंजूस दादाजी के मशहूर किस्से भाग २ | Story in Hindi

तपती धुप में बस से उतर गए उन बच्चो के बारे में भी नहीं सोचा।

मै अपने दोस्त अशोक के गाव उसकी शादी में जा रहा था। उसका घर बनारस से 30 किलोमीटर दूर था। मई का महिना था, गर्मी बहुत ज्यादा थी मौसम एकदम तप रहा था। मैंने बनारस से अशोक के घर जाने के लिए बस में बैठ गया। दोपहर के एक बज रहे थे बहार लू चल रही थी। बस जा रही थी एक घंटे का सफ़र था लोग बस में चढ़ रहे थे और कुछ लोग उतर भी रहे थे।

मै अपनी सीट पर बैठा था गर्मी मुझसे भी बर्दास्त नहीं हो रही थी लेकिन क्या करे मैंने अपने साथ पानी लिया था, तो बार बार पानी पि रहा था और खिड़की से बहार कि ओर देख रहा था। आधा रास्ता तय कर चूका था तभी एक दादाजी 3 बच्चो को लेकर बस में चढ़े। दादाजी जी ने धोती और कुरता पहन रखा था लेकिन उनके पैरो में चप्पल या जूता कुछ भी नहीं था नंगे पर ही थे और उनके बच्चो के पैरो में भी चप्पल नहीं थी। बच्चे भी लगभग तेरह चौदह बरस के लग रहे थे। बस में एक भी सीट खाली नहीं थी इसलिए वे बच्चो के साथ बस में खड़े यहाँ वहा बैठने के लिए सीट देख रहे थे।

तभी दादाजी के पास बस का कंडक्टर आया और टिकट लेने के लिए बोला दादाजी ने कहा उनकी एक और तीनो बच्चो कि हाफ टिकट काट दो, कंडक्टर बोला बच्चे बड़े है पूरा टिकट लगेगा। दादाजी तैयार नहीं थे बच्चो का पूरा टिकट लेने के लिए उन्होंने इस बात पर बहस कर लिया कंडक्टर से। कंडक्टर ने फिर कहा कि मेरी नौकरी का सवाल है कम से कम एक बच्चे का तो पूरा टिकट लेना ही पड़ेगा।

लेकिन दादाजी पूरा टिकट लेने को तैयार ही नहीं हो रहे थे। बस के सभी लोग उस समय उन लोगो को ही देख रहे थे मै भी देख रहा था, मुझे तो उन बच्चो पर बहुत तरस आ रहा था कि अगर कंडक्टर ने इन्हें बस से उतर दिया तो ये इतनी धुप में नंगे पैर कैसे जायेंगे। तेज धुप कि वजह से सडके भी काफी गरम थी, इतनी गरम कि सडको पर स्थित डाम्बर भी पिघल रहे थे। मेरे मन में यह ख्याल आया कि क्यू न मै ही इन बच्च्चो कि टिकट के पैसे दे दू।

फिर दादाजी का मिजाज देखकर हिम्मत नहीं हुई और दादाजी बुरा मान जायेंगे इसलिए मै चुपचाप बैठा देखता रहा। अंत में समझाने के बाद भी दादाजी नहीं माने तब कंडक्टर ने उन्हें बस से उतरने को कहा और दादाजी अपने तीनो बच्चो को लेकर तपती धुप में बस से उतर गए उन बच्चो के बारे में भी नहीं सोचा। मै पुरे रास्ते उन बच्चो के बारे में सोचता रहा और मुझे बहुत अफशोस भी हुआ कि मैंने उन बच्चो कि मदद नही किया और इस बात बहुत दुःख भी हुआ।

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