गौतम बुद्ध के द्वारा कर्म के अनुसार जीवन मरण का चक्र का वर्णन

सुख, दुःख, सुन्दर, कुरूप, अमीर, गरीब, जन्म मिलता है कर्म के आधार पर।

हम लोग “बुद्धम् शरणम गच्छामि” कहते है। इसका अर्थ यह है कि हम भगवान् गौतम बुद्ध के शरण में जायेंगे। लेकिन हम बुद्ध के शरण में क्यों जायेंगे क्या कारण है जाने का? कोई कारण तो होना चाहिए। आजकल हम ऐसा कह सकते है कि बुद्धम् शरणम् गच्छामि हम बुद्ध कि शरण में जायेंगे लेकिन बुद्धिमान लोग ऐसा नही करते है।

बुद्धिमान लोग कुछ भी कहने के पहले सोचते है कि क्यू हम बुद्धम शरणम् गच्छामि कहेंगे उसका मतलब क्या है? क्या फायदा है कहने का? बुद्धं शरणम् गच्छामि का अर्थ यह है कि जो सत्य नही जानते है वो सभी लोग अनाथ है। अनाथ का अर्थ है जिसके माता पिता नहीं है या इस संसार में उसका अपना कोई भी नहीं है जो उसका मार्गदर्शन करे उसकी जिम्मेदारी ले। या गार्डियन नहीं है तो वह बालक अनाथ है। उस बालक को किसी कि शरण चाहिए। वैसे ही हम लोगो कि भी शरण चाहिए। हम लोग भी सत्य को नहीं जानेंगे तो हम लोग भी अनाथ है।

बुद्ध ने संसार के बारे में बताया है। यहा संसार का अर्थ है इस जन्म और मृत्यु के संसार से है। भगवान बुद्ध के पास भी मुक्ति प्राप्त करने का कारण था। भगवान् बुद्ध ने देखा कि यहा सभी लोग बीमार पड़ते है, सभी लोग बूढ़े होते है सभी लोग मरते है, सभी लोग अपने प्रिय चीजो से प्रिय लोगो से प्रिय सम्पत्ति से विदा हो जाते है। इससे कोई भी नहीं बच सकता है। सभी को इस संसार के चक्र गुजरना ही पड़ता है। बाकि लोग कहेंगे कि यह भगवान् कि इच्छा है, हम भगवान् से प्रार्थना करेंगे।

बुद्ध कहते है कि इस संसार में जो भी कुछ घटित होता है उस हर एक घटना का कारण होता है। बिना कारण के इस संसार में कुछ भी घटित नहीं होता है। हर एक का कारण है। इसीलिए बुद्ध ने यह कारण दिखाया कि बीमार होना, बुढा होना, अपने प्रिय चीज, अपने प्रिय लोग, अपनी प्रिय संपत्ति से विदा होना। भगवान् बुद्ध ने बीमार होना, बुढ़ापा आना, अपने प्रिय चीज, प्रिय लोग, प्रिय संपत्ति से विदा होना इन सभी दुखो मुक्ति पाने का मार्ग खोज लिया।

बुद्ध ने देखा एक नदी के किनारे तिस भंते ध्यान कर रहे थे। उनका मन पहला ध्यान, दूसरा ध्यान, तीसरा ध्यान चौथे ध्यान तक चला गया। चौथे ध्यान में मन एकदम कोमल होता है एकदम शुद्ध सोने कि तरह। यह मन इतना मुलायम होता है कि इस मन से पिछला जन्म देख सकते है। इस मन से दुसरो का मन देख सकते है। दुसरो के पिछले जन्म को भी देख सकते है। उसके भी पिछले जन्म को देख सकते है। यह मन इतना मुलायम होता है कि यह मन देवताओ का, प्रेतो कि आवाज को भी सुन सकता है।

ध्यान बहूँत ही गहरा होने के बाद आप भी यह सब कर सकते है। बुद्ध के समय में गृहस्थ लोग भी यह सब किये थे और बालको ने भी यह किया था। आज से समय में भी कर सकते है लेकिन उसके लिए विश्वाश होना चाहिए। और उसकी पूर्ण जानकारी होनी चाहिए। उन तिस भंतेगन का मन चौथे ध्यान में आने के बाद बुद्ध ने उनके मन को अच्छे से देखा और उन्हें यह अनुभव हूँआ कि अब यह तिस भंते अपने पिछले जन्म को देख सकते है। अब इनलोगों को यह ज्ञान प्राप्त होने के लिए बुद्ध उपदेश देंगे। यह सोचकर भगवान् बुद्ध ने उन लोगो को अनपी आवाज़ सुनाई, उनकी आवाज़ सिर्फ वे तिस भंते ही सुन सकते है क्योकि वे पूरी तरह से ध्यान में है और यह बात मन मन से हो रही है।

बुद्ध ने पूछा भिक्षु आप मेरी बात सुन रहे है, भिक्षुओ ने कहा, जी तथागत सुन रहे है। बुद्ध ने कहा तो भिक्षु अपने पिछले जन्म में देखिये। अपने सारे पिछले जन्म में देखिये जितना पीछे देख सकते है अरबो अरब जन्म में देखिये जितना गिन नहीं सकते उतना पीछे तक देखिये। भिक्षुओ ने कहा तथागत हमने देखा। बुद्ध ने कहा तो बताइए पिछले जन्म में बकरी बनने के बाद आपका गला कटा कि नही। भिक्षु ने कहा भगवान् हम गिन नही सकते कि कितनी बार हम बकरी बने और हमारा गला भी काटा गया। बुद्ध ने पूछा भंते यह देखकर बताये कि गला काटने से जो खून बहा है वो ज्यादा है या समुन्द्र का पानी ज्यादा है। भंते ने देखकर कहा भगवान् खून ज्यादा है यदि जमा करेंगे तो समुन्द्र के पानी से। मुर्गा बनने के बाद भी वही है। गला काटने के बाद जो खून बहा है वो जमा करेंगे अब तक का तो यह समुन्द्र के पानी से भी अधिक हो जायेगा। भगवान् ने पूछा भिक्षु आपकी माँ मरी होगी। भिक्षु ने कहा भगवान् गिन नहीं सकते इतनी बार मेरी माँ मर गयी। भगवान् ने कहा पूछा जब माँ मरी तुम रोये होगे वो आंसू जमा करेंगे तो कितना होगा? भिक्षु वो आंसू जमा करेंगे तो समुन्द्र के पानी से ज्यादा आंसू जमा हो जायेगा इतनी बार मै रोया। भिक्षु आप कोई गुंडा या चोर बने है? भगवान् अनगिनत बार बना हूँ, गुंडा बना हूँ, चोर बना हूँ, डाकू बना हूँ। हाथ पैर काटते समय कितना खून बह गया। भगवान् समुन्द्र के पानी से ज्यादा खून बह गया।

आगे भगवान् ने कहा इस पूरी धरती कि मिट्टी को लड्डू जैसा छोटा छोटा करके अलग करेंगे तो ये मेरी इस जन्म कि माँ, दूसरा लड्डू हटायेंगे तो उस माँ कि माँ, तीसरा लड्डू हटायेंगे तो उस माँ कि माँ, ऐसा करते करते सब हटा दिया तो उस लड्डू जैसी मिट्टी ख़तम हो जाती है लेकिन माँ नही। पूरी धरती कि सब लकड़ी दो दो इंच से काटकर अलग अलग करेंगे तो यह मेरे पिताजी फिर ये पिताजी के पिताजी, उसके बाद उनके पिताजी के पिताजी। ऐसा करते करते लकड़ी ख़तम हो जायेगा लेकिन पिताजी नहीं ख़तम होंगे। बद्ध ने इसके बाद कहा भिक्षु यही संसार है।

आपको इस खतरनाक संसार से मुक्त होने का मौका मिल गया। जानवर बन गये, देवता बन गए, राजा बन गये, लड़की बन गये, लड़का बन गये, नरक में गये, सुख मिला, दुःख मिला अभी तक चल रहा है क्योकि मन के राग कि वजह से चल रहा है क्योकि मन में जो क्रोध है वह ख़तम नही कर पाया है। मन में मोह है मोह कि वजह से अभी तक चल रहा है। मन कि यह गन्दगी ख़तम कर दिया तो यह संसार ख़तम संसार ख़तम तो दुःख ख़तम। ऐसा बोलने पर सभी भंतो ने अपने मन से सारी गन्दगी को अपने मन से मिटा दिया, और आत्म को प्राप्त किया।

भगवान् एक बार अपने शिष्यों के साथ जा रहे थे उन्होंने रस्ते में देखा तो एक चीटियों का बड़ा झुण्ड वहा से एक लम्बी कतार में जा रहा था। भगवान् यह देखकर मुस्कुराये तब एक शिष्य ने उनसे मुस्कुराने का कारण पूछा तब भगवान् ने कहा भंते तुम उसे देख रहे हो जो चीटियों के इस कतार में सबसे आगे चल रहा है वह अट्ठाईस बार इस धरती का राजा बन चूका है जो दूसरा उसके पीछे है वह इक्कीस बार तीसरा उनतीस बार ऐसा इसमें एक भी नहीं है जो धरती का राजा नहीं बना, एक भी नहीं है जो देवता नहीं बना, ऐसा एक भी नही है जो देवलोक नही गया। लेकिन अभी ये जानवर है क्यों तथागत ऐसा होता है? क्योकि इन लोगो ने मानव जन्म मिलने के बाद उसका फायदा नही उठाया। उस मानव जन्म का सही उपयोग नहीं किया। खाया, पिया ऐश किया, आराम किया, मौज किया जीवन ख़तम कर दिया। बिना मतलब का जीवन जिया अब जानवर और कीड़े मकोड़े बन गए। यह खतरा हम सबके लिए है हममें से कोई भी इससे बच नहीं सकता है। इसके लिए एक मार्ग है जिसके करने से हम बच सकते है।

इसके लिए एक मार्गदाता चाहिये जो हमारा मार्गदर्शन अर्थात एक गुरु चाहिए जो हमें सही मार्ग दर्शन दे। वह गुरु स्वयं सर्वज्ञानी होना चाहिए। इसीलिए हम बुद्धम शरणम् गच्छामि कहते है। क्योकि भगवान् बुद्ध ने सबकुछ जान लिया, देख लिया, मालूम हो गया। इसलिए उनके शरण में आ गये या उनकी बातो को मान लिया तो हम कुछ कर सकते है। इसीलिए हम कहते है बुद्धं शरणम् गच्छामि। इसलिए हमें बुद्ध कि शरण में जाना चाहिए। बुद्ध ने बताया है कि सही गुरु को कैसे पहचाने और गुरु में कितने गुण होने चाहिए।

बुद्ध बताते है कि गुरु में नौ गुण होने चाहिए पहला गुण है अर्हन, अर्हन अर्थात उनके मन में किसी भी प्रकार कि गन्दगी नहीं होनी चाहिए, सारी इच्छा ख़तम होनी चाहिए। दूसरा गुण है सम्मा सम्बुद्ध। भगवान् बुद्ध ने चार सत्य प्राप्त किया यह चार सत्य यह है कि पहला सत्य सभी लोग बीमार पड़ते है, बूढ़े होते है, प्रिय चीजो से विदा होते है, मर जाते है। यह सब सुख है या दुःख है? और हम हमेश जवान रहना चाहते है अपने परिजनों से प्रिय चीजो से विदा नहीं होना चाहते है मरना नहीं चाहते है। मन में चिंता अफ़सोस दुःख यह सब होता है। यह सब प्रत्येक मनुष्य के साथ है, प्रत्येक देवता के साथ है, प्रत्येक जानवर के साथ है। यह सब दुःख है और इन सब दुखो के उत्पन्न होने का कारण भी है,और इसका कारण है मनुष्य कि इच्छा और प्यार।

बुद्ध ने कहा एक बार वे जा रहे थे रस्ते में उन्होंने एक बूढ़े व्यक्ति को देखा वह व्यक्ति रो रहा था, बुद्ध ने उससे पूछा क्या हूँआ क्यू रो रहे हो? उस व्यक्ति ने कहा मेरा पोता गुजर गया इसलिए मुझे बहूँत दुःख हो रहा है। भगवान् बुद्ध ने कहा क्या करे? प्यार से ही दुःख मिलता है। बूढ़े व्यक्ति ने कहा नहीं प्यार से दुःख नहीं मिलता, प्यार से सुख मिलता है। हम अपने परिवार को प्यार करते है उससे सुख मिलता है भगवान् बुद्ध ने कहा नहीं, प्यार से दुःख मिलता है। उसने फिर कहा प्यार से सुख मिलता है, बुद्ध ने फिर कहा नही प्यार से दुःख मिलता है। उस व्यक्ति ने फिर कहा नहीं प्यार से सुख मिलता है और वहां से चला गया।

वह आगे एक दूकान पर गया वहा कुछ लड़के जुआ खेल रहे थे वहा जाकर उस व्यक्ति ने कहा कि मैंने आज बुद्ध को सिखाया। उन लडको ने पूछा कि आपने बुद्ध को क्या सिखाया? उसने कहा बुद्ध ने उससे कहा कि प्यार से दुःख मिलता है फिर मैंने कहा प्यार से तो सुख मिलता है। सब लडको ने कहा हा सही बात है प्यार से तो सुख मिलता है बुद्ध आज हार गया। यह बात हर जगह आग कि तरह हर जगह फ़ैल गयी।

कौशल राजा के पास भी यह बात पहूँच गयी। कौशल राजा अपने रानी से कह रहे थे कि देखिये रानी इतने बड़े लोग कैसे जो मुह में आये वह नही बोलना चाहिए, कुछ सोच कर बोलना चाहिए। प्यार से दुःख मिलता है यह झूठ है, प्यार से तो सुख मिलता है। रानी कि भगवान् बुद्ध के प्रति बहूँत श्रद्धा थी। उसने सोचा कि भगवान् बुद्ध ने कुछ कहा है तो उसका कुछ मतलब होगा कुछ कारण होगा बिना मतलब उनके मुख से एक भी शब्द नहीं निकलता है।

रानी ने एक मंत्री को बुलाकर कहा कि जाकर भगवान् बुद्ध से इसका मतलब पता कीजिये जो उन्होंने कहा है इसका मतलब क्या है? वह मंत्री बुद्ध के पास गया और उनसे पूछा? बुद्ध ने कहा मंत्री तुम्हारा पुत्र कहा है? मंत्री ने कहा वह पढने गया है। बुद्ध ने कहा वह पुत्र रोज वक्त पर घर पहूँच जाता है यदि वह एक दिन देर से आया तो? मंत्री ने कहा भगवान् डर लगता है? बुद्ध ने फिर कहा यदि रात हो गयी फिर भी तुम्हारा बेटा घर नही आया तो? हम अपने और मंत्रियो को उसे खोजने के लिए भेज देते है कि जाओ और मेरे बेटे को खोज कर लाओ और हम भी घर से उसे खोजने निकल जाते है।

बुद्ध ने फिर कहा यदि आपको खबर मिले कि आपके बेटे को मार दिया गया है तो क्या होगा? मंत्री ने कहा भगवान् हम जी नहीं पाएंगे। बुद्ध ने पूछा क्यू? मंत्री ने कहा हम अपने बेटे से बहूँत प्यार करते है। बुद्ध ने कहा इसीलिए मैंने कहा प्यार से दुःख मिलता है। यदि दुसरे प्रदेश में पचास बच्चे मर गए तब आपको दुःख होगा? मंत्री ने कहा नही। बुद्ध ने पूछा क्यू? क्योकि उनके प्रति मेरे दिल में प्रेम नही है। इच्छा नही है। इसीलिए मैंने कहा दुःख का कारण प्यार है, इच्छा है तृष्णा है। मंत्री ने यह सब बात रानी को बतायी और रानी समझ गयी।

रानी ने कौशल राजा से कहा महाराज आप मुझसे प्रेम करते है? महाराज ने कहा हा आपको प्यार नहीं करेगे तो किसे प्यार करेंगे? फिर रानी ने कहा महाराज यदि मूझे कुछ हो गया तो? राजा ने कहा ऐसी अशुभ बाते मत करो। रानी ने फिर कहा नहीं फिर भी मुझे कुछ हो गया तो तब राजा ने कहा हम भी मर जायेंगे। तब रानी ने कहा इसीलिए भगवान् बुद्द्ध ने कहा कि प्यार दुःख मिलता है। बुद्ध ने बताया एक लड़का एक लड़की से अत्यधिक प्रेम करता था वह उस लड़की के बिना एक पल भी नहीं रह पता था।

एक दिन उस लड़के ने उस लड़की को जिसे वह बेहद प्रेम करता था उसे किसी और लड़के का हाथ पकड़कर जाते हूँए देखा तो वह चौक गया। उसे बहूँत बड़ा झटका लगा कि जिसे वह अपनी प्राणों से अधिक प्रेम करता है वह किसी और के साथ जा रही है। उसे बहूँत दुःख हूँआ वह उस लड़की के पास गया और उससे अपने साथ चलने के लिए कहा, अपने प्यार के लिए उसके आगे हाथ पैर जोड़ा खूब रोया लेकिन वह लड़की उसके साथ नहीं आई। वह लड़की उसे छोड़कर चली गयी। उसके बाद उस लड़के ने उस लड़की के लिए जो भी प्यार स्नेह उसके दिल में था सबकुछ ख़तम कर दिया। उसकी यादो को भी मिटा दिया। उसे अपने जीवन से बहार निकाल दिया।

उसने और कुछ दिनों के बाद उसी लड़की को किसी और लड़के के साथ उसका हाथ पकड़कर जाते हूँए देखा। तब उसे उसका कोई दुःख नही हूँआ क्योकि अब उसके मन में उस लड़की के लिए कोई प्यार नहीं था। इसीलिए बुद्ध ने बताया प्रेम से ही दुःख और शोक उत्पन्न होता है। प्रेम से भय उत्पन्न होता है। यदि हम प्रेम से मुक्त हो जाए तो कोई दुख, कोई भय, कोई शोक नही उत्पन्न होगा। सभी दुखो का कारण प्रेम और इच्छा है। किसी दुसरे का घर जल गया तो हमें कोई पीड़ा नहीं होगी लेकिन अपना घर जल गया तो? बहूँत तकलीफ होगी। इसलिए यह दुःख ख़तम कर सकते है। इच्छा, प्रेम अपने मन से ख़तम कर दिया तो दुःख भी ख़तम हो जायेगा।

बुद्ध ने इन चार सत्य को बहूँत से गुरुओं से पूछा कि कैसे दुःख ख़तम होता है लेकिन इसके बारे में कोई नही जानता है। इसलिए बुद्ध को अकेले ही बोध गया में ज्ञान प्राप्त करना पड़ा। कोई गुरु नही था। बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त करने के बाद आँख बंद करके देखा कि वो सबकुछ जान गये। लेकिन देखा कि उनसे उपदेश लेने के लिए उनसे ज्यादा शीलवान, ग्यानी, ध्यानी कोई ब्र्म्हलोक में होगा। उन्होंने आँख बंद करके ब्र्म्हलोक में प्रत्येक के मन को देखा ब्र्म्हलोक में उनसे ज्यादा कोई नहीं है। देवलोक में शायद होगा? क्योकि उनको भी कोई गुरु चहिये। प्रत्येक देवता के मन को देखा, देवलोक में भी कोई नहीं तब सोचा कि शायद मनुष्यलोक में होगा। मनुष्यलोक में प्रत्येक मनुष्य के मन को देखा, मनुष्यलोक में भी नहीं। अंत में उनको समझ में आया शील, समाधि, प्र्दना, ज्ञान इन सब में तथागत से उत्तम और कोई है ही नहीं। फिर भी उनको गुरु चाहिए, उन्होंने जो ज्ञान प्राप्त किया उस ज्ञान ने उन्हें गुरु बना दिया। इसीलिए उनको सम्मासम बुद्ध कहते है।

बिना गुरु के उपदेश से और सत्य सत्य प्राप्त किया अकेले ही। तीसरा गुण है विग्याचर्ण संपन्न। आजकल हम साइंस को विज्ञान कहते है। साइंस पर बहूँत लोग विश्वास करते है। लेकिन साइंस यह क्या है कि आज कुछ खोज किया तो अगले कुछ महीनो में बदल जाता है अगले महीनो में कुछ और खोज कर लेते है। यह बदलता रहता है। पिछले महीने का साइंस कुछ महीनो के बाद नया कुछ खोज निकाल देता है, कि यह ऐसा नही ऐसा है। बुद्ध के पास भी साइंस है लेकिन वो कभी बदलने वाला साइंस नही है। साइंस निरंतर बदलते रहता है। विज्ञानं निरंतर नहीं बदलता है।

हजारो वर्ष पहले भी यही विज्ञान था अभी भी यही विज्ञान है। आज के समय में बहूँत से गुरु है जो अलग अलग तरीके से अपने ज्ञान को बताते और उसे बुद्ध का ज्ञान कहते है जबकि ऐसा नहीं है। वे उसमे उनके खुद के भी ज्ञान को भी डाल देते है खुद का अनुभव बताते है। तब उन किताबो को पढने वाले लोग उस लेखक का ज्ञान लेते है न कि बुद्ध का। लेखक ने जो कुछ लिखा हा उसे पढ़ने वाले यही सोचता है कि यह बुद्ध ने कहा है। इसलिए बहूँत ही सोच समझ कर ज्ञान लेना चाहिए। मान लीजिये आपने किसी ज्ञान को जान कर उसे दस सालो तक उसका पालन कर रहे हो और दस साल के बाद कोई आकर कहे कि नहीं ऐसा नहीं है यह आप गलत कर रहे है। तब उनको लगेगा नहीं यह गलत नहीं हम दस साल से इसकी प्रक्टीस कर रहे है। इसलिए सुरु में ही सही रास्ते का चुनाव करके ही पकडे। बाद में बदलना बहूँत मुस्किल होता है। बहूँत तकलीफ होती है।

बुद्ध के पास एक विद्या है जिससे वह अपनी आंख बंद करके सबकुछ देख सकते है। एक विद्या और है जिससे सबकुछ सुन सकते है, जिसे दिव्य्श्रोत कहते है। एक दिन बक नाम के ब्रम्हाण जी थे उनकी उम्र करोडो वर्ष थी तो उनके मन में आया कि वे सदा के लिए अमर है, नित्य है उन्होंने ही इस पुरे धरती को बनाया है। ऐसी एक दृष्टि बक ब्रम्हाण जी के मन में आ गया भगवान् ने यह सुन लिया।

भगवान् बुद्ध तुरंत बक ब्राम्हण जी के पास गए, और उन्हें बताया कि हे बक ब्राम्हण आपके मन में गलत विश्वाश आ गया है। बक ने कहा सबकुछ सदा काल के लिए है, बुद्ध ने कहा कुछ भी सदा के लिए नहीं है पिछले जन्म में आप मनुष्य थे मनुस्य्लोक में थे। वह आपने ध्यान करके उस पुन्य के फल से ब्रम्ह लोक में आ गये। लेकिन आपकी उम्र लम्बी है इसलिए आपको सदाकल के लिए लग रहा है, करोडो वर्ष के बाद आपकी उम्र ख़तम हो जाएगी फिर आप जानवर बन जायेंगे। इस बात पर बक ब्राम्हण जी को गुस्सा आ गया, कि ऐसा कैसे हो सकता है। बक ब्राम्हण ने कहा हम अदृश्य हो जाते है आप हमें खोज कर दिखाए। बक जी ने अदृश्य होने कि कोशिश किया लेकिन नहीं हो पाए। फिर बुद्ध ने कहा मै अदृश्य होकर दिखता हूँ आप मुझे खोजकर दिखाए।

भगवान् बुद्ध अदृश्य होकर बताये। बुद्ध ने कहा इस संसार में नित्य(permanent) कुछ भी नही है। सब नस्वर है चाहे देवता, ब्राम्हण, मानव हर जगह अनित्य(temprery) है, हर जगह दुःख है। इतना कहकर बुद्ध अदृश्य हो गये। भगवान् कोई भी आवाज़ सुन सकते है सभी लोगो के भाग्य के बारे में देख सकते है। भगवान् बुद्ध सभी लोगो को समझ में आये सभी उनकी बातो से संतुष्ट हो ऐसी बात करते है। हमारे आपके के कहने पर कोई लोग गुस्सा भी हो सकते है, कोई खुश भी हो सकते है, कोई नाराज़ भी हो सकते है।

बुद्ध के पास और एक विद्या है उस विद्या को रिद्दीसिद्दी कहते है। उनके शारीर पर अनेको बाल है वह एक बाल से आग निकाल सकते है तो दुसरे बाल से पानी निकाल सकते है। बुद्ध जमीन के रस्ते से जा सकते है, पानी के अन्दर से जा सकते है आसमान से जा सकते है। यह सिर्फ बुद्ध कर सकते है। बोधगया से वह श्रीलंका गये थे आसमान से। उनके पास और एक विद्या है जिसके द्वारा वह पिछले अरबो जन्म जन्म को देख सकते है। उसमे आप कहा थे क्या किया कहा रहे सब देख सकते है। और एक विद्या है कि सब लोग अपने मन में सोचकर कर्म करते है। जो प्रत्येक कर्म करने के लिए सोचते है उसमे कर्म बन जाता है।

सोचिये रास्ते में जाते समय हमारे पैरो के निचे दबकर छोटे छोटे कीड़े मर जाते है, लेकिन वहा हमारी सोच उनको मरने कि नहीं होती है इसलिए उसमे कर्म नहीं बनता है। यदि हम उन छोटे छोटे कीड़ो को जानबूझकर दबा दबा के मारे और कहे कि मर जाओ तब वह हमारा कर्म बन जाता है। उस कर्म के आधार पर लोगो को जन्म मिलता है। सुख, दुःख, सुन्दर, कुरूप, अमीर, गरीब, जन्म मिलता है कर्म के आधार पर।

एक दिन रास्ते में जाते समय एक कुत्ता बुद्ध को भौकने लगा, बुद्ध ने देखा यह कुत्ता मुझे क्यू भौक रहा है तब उन्होंने उसके पिछले जन्म को देखा तो पता चला कि यह इस घर मालिक था, इसका नाम तोदेयी था। पिछले जन्म में लेकिन इस जन्म में वह कुत्ता बन गया है। बुद्ध ने कहा तोदेयी तुम पिछले जन्म में भी भौकते थे इस जन्म में भौक रहे हो यह सुनने के बाद कुत्ता शांत हो गया और घर के अन्दर चला गया। यह सब नौकर ने देख लिया और अन्दर जाकर शुभ को बताया। शुभ तोदेयी का बेटा है।

नौकर ने कहा मालिक बुद्ध ने आपके पिताजी के नाम से कुत्ते को डाटा। यह सुनते ही शुभ तुरंत बुद्ध के पास पहूँच गया और उनसे पूछा कि आपने मेरे पिताजी के नाम से कुत्ते को डाटा है? बुद्ध ने कहा सुभ मै कभी किसी को नहीं डाटता हूँ लेकिन वो आपके पिताजी है। सुभ गुस्सा हो गया और बोला में कि मेरे पिताजी कुत्ता नहीं बन सकते है। बुद्ध ने फिर बताया लेकिन सुभ को विश्वाश नहीं हो रहा था, तब बुद्ध ने बताया सुभ आपके पिताजी सोने कि लाठी, सोने कि चप्पल का उपयोग किया, सोने कि थाली में खाना खाते थे, वह सब कहा है?

सुभ ने कहा हा सही बात है लेकिन यह सब कहा है मुझे नहीं पता। बुद्ध ने कहा वह कुत्ता बतायेगा घर जाओ, कुत्ते को अच्छे से स्नान कराओ, भरपेट खीर खिलाओ, नींद आने तक सर सहलाओ इसके बाद नींद आते समय उनके कान में धीरे से पूछना पिताजी सोने कि लाठी चप्पल और थाली कहा है? तब वो बताएँगे। सुभ यह देखने के लिए अपने घर गया उसने वैसा ही सबकुछ किया और कुत्ते से पूछा तब कुत्ते ने घर के अंदर एक कोने ने सुभ को लेकर गया उस कमरे में कोई नही जाता था वहा गया और अपने पैरो कोने पड़ी चीजो को हटाया तब उसके निचे सोने कि लाठी चप्पल और थाली मिल गयी। तब सुभ को यकीं हूँआ कि वह उसका पिताजी है जो इस जन्म में कुत्ता बन गया है। उसने कुत्ते के सर पर हाथ रखा और कहा अरे मेरे पिताजी कुत्ता बन गये।

वह दौडकर बुद्ध के पास गया और बुद्ध मुझे माफ़ कीजिये मै सब समझ गया। सही बात है मेरे पिताजी ने कभी भी पुन्य नही किया, कभी दान नही दिया, मन कि शांति के लिए कुछ नही किया। शुभ ने बुद्ध से कहा भगवान् मेरे मन में बहूँत पहले से एक प्रश्न है क्या मै पूछ सकता हूँ? बुद्ध ने कहा अवश्य पूछो।

शुभ ने पूछा भगवान् संसार में लोग अमीर, गरीब, सुन्दर, कुरूप कैसे होते है? कोई बड़े परिवार में होते है कोई छोटे परिवार में होते है। यह सब कैसे होता है? किसी कि उम्र लम्बी होती है, किसी कि उम्र छोटी होती है, कोई बहूँत स्वस्थ रहता है कोई बहूँत बीमार रहता है यह सब कैसे होता है? यदि हम किसी से पूछे तो लोग कहते है कि यह उपर वाले कि देंन है। बुद्ध ने बताया कर्म ही इसका कारण है। जन्म लेने कि जगह कर्म बनाता है। सभी लोगो का बंधू रिश्ता उनका कर्म ही है। कर्म से ही सबकुछ बनता है और बिगड़ता है। सभी का कर्म ही उनका शरण है। कर्म ही सबका दहेज़ बन जाता है।

बुद्ध ने बताया जो लोग प्राणियों कि हत्या करते है वे लोग कम उम्र में मर जाते है। या पेट से निकलने के बाद या बचपन में मर जाते है। वे लम्बे समय तक जीवित नहीं रहते। जो किसी कि हत्या नही करते है उनकी उम्र लम्बी होती है।

जो लोग दुसरो को परेशान करते है, दुःख देते है, हाथ पैर से मारते है, गालिया देते है। ऐसे लोग जनमो जनम बीमार पड़ते है। इलाज में लाखो करोडो रुपये लगते है। पुरे जीवन बीमार रहते है। जो लोग दुसरो पर दया करते है किसी को परेशान नहीं करते है। ऐसे लोग जनम से स्वस्थ रहते है कभी कभी सर्दी जुखाम हो जाता है इससे ज्यादा कुछ नही होता है। वह सर्दी भी एक दो ख़ुराक दवा लेने से ठीक भी हो जाता है। दवा पर ज्यादा खर्च नही होता है।

जो लोग अत्यधिक गुस्सा करते है। हमेशा गुस्से में ही रहते है। उनके दिमाक में हमेशा गुस्सा ही भरा रहता है, ऐसे लोग कुरूप होते है। बहूँत कुरूप होते है, उनको देखने में ही खराब लगता है। जो लोग दोस्ती करते है किसी पर गुस्सा नहीं करते है। किसी के बारे में बुरा नहीं कहते है, किसी धर्म के बारे में बुरा नहीं कहते है। अपने दुश्मन से भी अच्छा व्यव्हार करते है। ऐसे लोग जन्मो जनम खूबसूरत होते है। खूब सुन्दर दीखते है बहूँत सुन्दर होते है।

जो लोग कंजूस होते है, कसी को कुछ नहीं देते, दान नहीं करते है। ऐसे लोग जीवन मुश्किल से बिता पाते है। उनको खाना भी मुश्किल से मिलता है, कपडा मुश्किल से मिलता है। जो लोग दान देते है, अच्छे से देते है, प्रसन्न मन से देते है, अच्छी चीज दान देते है। कपडा दान देते है तो अच्छे से, इत्र लगाकर देते है। अच्छे से देते है। इज्जत से देते है फेक कर के नही देते है। साधू संत को भी देते है तब इज्जत से देते है उनको नमन करते है। ऐसे लोगो को जनम जनम भर खानपान, रहन सहन में कभी भी कोई कमी नहीं रहती है। सभी सुविधाए रहती है। जो लोग अपने से बड़े लोगो का माँ पिताजी भाई का इज्जत सम्मान नहीं करते है, उनको नमन नहीं करते है। ऐसे बड़े लोगो का इज्जत, सत्कार, सन्मान नहीं करने से नीच परिवार में जन्म मिलता है। नीच परिवार का अर्थ निचली जाती से नहीं है। नीच परिवार का अर्थ है वह कोई इज्जत नहीं करता है।

ऐसा परिवार हर देश में है। ऐसे बहूँत परिवार है जहा कोई इज्जत नही करता है। कही किसी काम से गया तो वहा से डाट कर भगा दिया जाता है। पुलिस स्टेशन गया तो वहा से डाट कर भगा दिया जाता है। कही काम करने के लिए गया तो वहा डाट सुनना पड़ता है। जो लोग अपने से बड़े लोगो का इज्जत सत्कार सम्मान करते है, उनको नमन करते है। ऐसे लोगो को जन्मो जनम ऊँचे परिवार में जन्म मिलता है। उंचा परिवार का अर्थ है यदि कही जाए तो वहा अत्यधिक सम्मान मिलता है जैसे कही गए तो वहा आइये, पधारिये बैठिये, आपका क्या काम है? क्या समस्या है? हम क्या सेवा कर सकते है? सब मदद करते है। आते ही सब प्रणाम करते है, नमन करते है। ऐसे हाथ जोड़ते है। दुसरो कि इज्जत करेंगे तब हमें भी इज्जत मिलेगी। ऐसे बुद्ध ने शुब को समझाया। किसी का रूप अलग है, आँखों का रंग अलग है, सभी का कपडा अलग है, सभी के घर का सुख अलग है, सबका पति अलग है, सबकी पत्नी अलग है, बच्चे अलग है।

सब आपलोग जिस प्रकार का कर्म करते है वो मिल ही जाता है। आज जो कर्म कर रहे है वो आगे मिलेगा। यह सबकुछ ख़तम कर सकते है आर्यअष्टांगिक मार्ग से। यह सबकुछ भगवान् बुद्ध ने देखा यह भी एक विज्ञानं है एक साइंस है।

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