कंजूस दादाजी के मशहूर किस्से - Part 1

October 9, 2020
kanjoos dadaji ke mashoor kisse

दादाजी के कंजूसी के किस्से पुरे गाँव में मशहूर थे।

उत्तर प्रदेश के किसी गाँव में एक दादाजी अपने परिवार के साथ रहते थे। वे बहुत चालाक और बुद्धिमान थे इसके साथ ही वे कंजूस भी बहुत थे। उनके कंजूसी के किस्से पुरे गाँव में मशहूर थे। पुरे गाँव में उनके जैसा कंजूस दूसरा कोई भी नहीं था। उनका कारपेट बनाने का खानदानी पेशा था उनके पास खेती भी थी। लेकिन वे पढ़े लिखे नहीं थे उस समय के लोग पढाई पर ध्यान भी नहीं देते थे। लेकिन पुरे गाँव में उनके जैसा बुद्धिमान भी कोई नहीं था। उनके दो बेटे थे एक मुंबई में रहता था और दूसरा उनके साथ रहता था। उनका बम्बई वाला कंजूसी में अपने बाप से भी दस हाथ आगे था।

एक बार कि बात है दादाजी के मुंबई वाले बेटे ने अपने परिवार को मुंबई बुलाया। उसने अपने पिताजी से कहा कि मेरे परिवार को मुंबई भेज दो मेरे पास। दादाजी के गाँव के कुछ लोग मुंबई जा रहे थे दादाजी ने सोचा क्यू न इन्ही गाँव वालो से साथ अपने बेटे के परिवार को भी मुंबई भेज दू। दादाजी ने गाँव वालो से बात करके अपने बेटे के परिवार को मुंबई भेजने का मन बना लिया।

मुंबई जाने के लिए उनके गाँव का सबसे नजदीक वाला रेलवे स्टेसन उनके गाँव से दस किलोमीटर कि दुरी पर था। ट्रेन का समय सुबह सात बजे का था। गाँव के बाकी लोगो ने अपने लिए पहले से ही स्टेसन जाने के लिया गाड़ी का प्रबंध कर लिया था। लेकिन दादाजी ने कोई भी गाडी नहीं किया क्योकि उन्होंने सोचा कि गाडी बुक करूँगा तो पैसे खर्च होंगे क्यू न मै अपने बेटे के परिवार को पैदल ही स्टेसन तक लेकर जाऊ दस किलोमीटर ही तो है और मेरे पैसे भी बच जायेंगे।

दादाजी ने बिलकुल ऐसा ही किया जिस दिन सुबह जाना था उसके पहले वाली रात को ही दादाजी ने कहा कि हम पैदल ही जायेंगे ट्रेन पकड़ने के लिए सब तैयारी कर लो। दादाजी के बेटे के परिवार में उनकी पत्नी और तीन बच्चे थे जिनको मुंबई भेज रहे थे सब बच्चे छोटे थे एक बच्चा तो सिर्फ एक साल का ही था। दादाजी जी ने उन बच्चो के बारे में भी नहीं सोचा कि ये सब दस किलोमीटर पैदल कैसे जायेंगे उन्हें सिर्फ अपने पैसे बचाने कि फिकर रहती।

उनको सिर्फ यही चिंता रहती कि उनके पैसे खर्च न हो फिर चाहे जो हो जाए चलेगा। उन्होंने रात के दो बजे ही अपने बेटे के परिवार को लेकर घर से निकल गये ट्रेन पकड़ने के लिए| उन्होंने ने हाथ में एक डंडा भी ले लिया सुरक्षा के लिए क्योकि रात में कुत्ते का या किसी और जानवरों का डर था। दादाजी आगे आगे जा रहे थे और उनके बहु और पोते उनके पीछे पीछे चलते जा रहे थे। रात के अँधेरे में वे जब किसी गाँव से गुजरते तब वह के कुत्ते उन्हें भौकने लगते और काटने को दौड़ते। जिससे उनके परिवार के लोग डर जाते और कुत्तो को भौकने के वजह से गाँव के लोग जाग जाते और उनको पूछते कि वे कौन है और कहा जा रहे है इतनी रात में परिवार को लेकर।

फिर दादाजी बोलते कि मंबई जा रहे है तब लोग उन्हें जाने देते ऐसा पूरी रात चलता रहा जब भी वे किसी गाँव से गुरते। दादाजी तो मजबूत थे लेकिन उनकी बहु और बच्चे नहीं चल पा रहे थे वे बहुत थक चुके थे रास्ते में ही चलते चलते वे जमीं पर बैठ जाते और कहते कि अब वे पैदल नहीं चल सकते।

लेकिन कंजूस दादाजी को कोई फर्क नहीं पड़ता वे थोड़ी देर आराम करते और फिर चलने को कहते रास्ते में कई गाँव वालो ने उन्हें समझाया कि गाडी बुक कर लिए होते। और कई लोग तो इनकी कंजूसी को देखकर हस्ते कि कितना कंजूस आदमी है। रात का समय था कुछ भी गलत हो सकता था। चलते चलते उनके परिवार के पैरो में छाले पड़ गए थे। वे चलते चलते एकदम पस्त हो चुके थे क्योकि वे कभी इतनी देर तक पैदल नहीं चले थे, और वो भी सामान लेकर।

किसी तरह वे सब रुकते चलते हुए सात बजे तक रेलवे स्टेशन पहुच गए। सब एकदम थक चुके थे उनसे खड़ा नहीं रहा जा रहा था स्टेशन पहुचने पर वे सब निचे बैठ कर आराम करने लगे उन्हें भूख और प्यास भी लगी थी। उन्होंने थोडा आराम किया और थोड़ी ही देर में ट्रेन भी आ गयी। उस ट्रेन में भी दादाजी ने टिकट का आरक्षण नहीं करवाया था जनरल डिब्बे में ही बैठा दिया।

कंजूस दादाजी के मशहूर किस्से - भाग २
- RAKESH PAL