रहने को घर नहीं सारा जहाँ हमारा है?

25 August, 2020
Rehne Ko Ghar Nahi Saara Jahan Hamara Hai

विद्या और विजय की खुशिया एक पल में बर्बाद हो गयी सारे सपने टूट गये।

विद्या एक अनाथालय में रहती थी जहाँ उसकी तरह सभी अनाथ लड़कियां रहती थी। वह महज बीस साल कि थी अपना गुजारा करने के लिये वह कपड़े सिलाई करती थी। अनाथालय कि बाकि सभी लड़कियां भी सिलाई का काम करती थी। अनाथालय में बाहर से कपड़े लाकर सिलने के लिए दिए जाते थे और कभी कभी कपड़े लाने के लिए जाना भी पड़ता था और कभी कभी कपड़े सिलाई करने के बाद पहुचाने के लिए भी जाना पड़ता था।

अनाथालय में कपड़े लाने और पहुचाने का काम उनकी हेड करती थी जिनका नाम सकुन्तला था। अनाथालय का देखभाल भी सकुन्तला जी ही करती थी। सकुन्तला जी अनाथालय कि मालकिन थी वह काफी नरम दिल कि थी वह अनथालय का और वहा कि लड़कियों का अच्छे से ध्यान रखती थी।

अनाथालय के उनके कुछ नियम थे जो कि वहा कि सभी लड़कियों को मानना पड़ता था। अनाथालय से किसी को भी बाहर जाने कि छुट किसी को भी नहीं थी सब काम सकुन्तला जी को पूछकर ही करना पड़ता था। कभी कभी सकुन्तला जी विद्या को बाहर कपड़े लेने और पहुचाने के लिए भेज देती थी वह विद्या को बहुत मानती थी उस पर उनको बहुत भरोसा था और विद्या भी अपने दिए हुए काम को बहुत जिम्मेदारी से निभाती थी।

विद्या जब कभी अनाथालय से बाहर जाती थी तो वह रिक्शे में जाती और रिक्शा स्टैंड उनके अनाथालय के सामने ही था। विजय भी उसी स्टैंड पर अपना रिक्शा खड़ा करता था।

विजय एक चैबिस साल का नौजवान लड़का था। वह रिक्शा चलाकर अपना गुजारा करता था उसका इस दुनिया में कोई भी नहीं था। वह दिन में रिक्शा चलता था और रात होने पर उसी रिक्शे में सो जाया करता था उसके पास अपना कोई घर भी नहीं था रहने के लिए इसलिए वह रिक्शे में ही रहता था।

एक बार विद्या विजय के रिक्शे में बैठी बाहर जाने के लिये, विजय विद्या को रिक्शे में लेकर जा रहा था रास्ते में उसने विद्या से बाते करना सुरु किया, पहले तो विद्या ने अपने बारे में विजय को कुछ नहीं बताया बस इतना बताया कि वह उस रिक्शा स्टैंड के सामने वाले अनाथालय में रहती है और उसका नाम विद्या है। विजय ने भी उसे अपने बारे में बताया इस तरह विद्या और विजय में जान पहचान हो गयी।

इसके बाद जब भी विद्या अनाथालय से कही बाहर जाती थी तब वह विजय के रिक्शे में ही बैठकर बाहर जाती थी रास्ते में विजय बाते करते हुए जाता और बीच बीच में हसी मजाक भी करता जिससे विद्या बहुत खुश हो जाती और खूब हस्ती जिसे देखकर विजय को भी बहुत अच्छा लगता। धीरे धीरे विद्या को विजय कि बाते अच्छी लगने लगी वह मन ही मन विजय को पसंद करने लगी। विजय भी आते जाते विद्या को देखता रहता था विजय को भी विद्या से प्यार हो गया।

अब विद्या बिना किसी काम के भी अनाथालय के बाहर विजय से मिलने के लिए आने जाने लगी। विजय विद्या को अपने रिक्शे में घुमाने के लिए लेकर जाता और फिर शाम को अनाथालय में छोड़ देता था और कभी कभी सिनेमा दिखने के लिए भी लेकर जाता था, यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा दोनों में गहरा प्यार हो गया और उन दोनों ने शादी करने कि सोची। इधर सकुन्तला जी ने भी इन दोनों को कई बार साथ में आते जाते देखा था उनको इन दोनों के प्यार के बारे में भी पता चल गया।

उन्होंने विद्या से इस बारे में बात कि और उसे समझाया लेकिन विद्या उनकी बात नहीं मान रही थी उन्होंने ने विद्या का बाहर निकलना बंद कर दिया जिसके कारण विद्या दुखी रहने लगी। सकुन्तला जी से विद्या का दुःख देखा नहीं गया और उन्होंने विजय को बुलाकर बात किया और उन दोनों कि शादी करने कि आज्ञा दे दी। यह बात सुनकर दोनों बहुत खुश हुए और शादी कि तैयारिया करने लगे लेकिन एक बड़ी समस्या थी विजय के सामने कि उसके पास रहने के लिए घर नहीं था शादी करने के बाद वह विद्या को कहा रखेगा।

विजय ने कुछ पैसो का बचाकर बैंक में रखे थे घर खरीदने के लिए उसने वह अपने बचाए हुए पैसे बैंक से निकल लिए और घर कि कीमत पता करने लगा लेकिन उसके बचाए हुए पैसो में एक छोटा सा कमरा भी मिलना मुस्किल था। कुछ दिनों के मसक्कत के बाद एक एजेंट ने उसे एक बस्ती में एक छोटा सा कमरा दिखाया लेकिन उस कमरे के लिए उसके बचाए हुए पैसे काफी नहीं थे। लेकिन शादी करके विद्या को घर तो लाना ही था विजय आखिर क्या करता उसका इस दुनिया में और कोई भी नहीं था अंत में विजय ने उस घर को खरीदने के लिए अपना रिक्शा बेच दिया और तब जाकर उस घर को ख़रीदा और शादी करके विद्या को अपने रूम पर ले गया।

लेकिन रिक्शा बेचने वाली यह बात उसने विद्या को नहीं बताई थी लेकिन जब वह विद्या को अपने रूम पर लाने के लिए किराये के रिक्शे में गया तब विद्या ने उससे पूछ ही लिया कि उसका रिक्शा कहा है तब विजय ने बताया कि उसे रूम लेने के लिए पैसे कम पड़ रहे थे इसलिए उसने अपना रिक्शा बेच दिया। दोनों अपने रूम पर गये अपना घर सजाया खाना खाया और सुहागरात मनाई।

अगले दिन सुबह एक आदमी एक हवालदार को लेकर विजय के घर पर आया और विजय को घर खाली करने को कहा विजय यह बात सुनकर चौक गया और उसने कहा कि उसने यह घर ख़रीदा है और उसके कागज दिखाने लगा लेकिन वह लोग कहा मानने वाले थे उन्होंने कहा कि ऐसे कागज तो रोज बनते है सौ रूपये में और यह हमारा रोज का काम है तुम जैसे लोगो को घर बेचना और खाली करवाना। अपनी मेहनत कि कमाई एक पल में बर्बाद होते हुए और इस धोके को विजय बर्दास्त नहीं कर पाया और लड़ाई करने लगा लेकिन वो लोग दो थे इसलिए विजय कुछ नहीं कर पाया उन लोगो ने विजय को जेल में डालने कि धमकी भी दी, विद्या दौड़ती हुई आई और विजय को रोक लिया और उसे समझाया।

थोड़ी देर बाद विद्या और विजय घर खाली करके अपने कपड़ो से भरा बैग लिए सड़क पर रोते हुए चलते जा रहे थे। उनकी खुशिया एक पल में बर्बाद हो गयी सारे सपने टूट गये अब वे कहा जाये कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

- RAKESH PAL