भारतीय रेल का सफर - यूपी और बिहार का सफर

January 15, 2022
journey of indian railways

भारतीय रेल मे सफर करना अपने आप मे एक अनोखा अनुभव है।

भारतीय रेल का सफर Journey of Indian Railways. भारतीय रेल मे सफर करना अपने आप मे एक अनोखा अनुभव है, ऐसा अनुभव शायद ही किसी अन्य देश मे देखने को मिले। भारत मे भारतीय रेल मे सफर करने के लिए बहुत जद्दोजहद करनी पडती है। खासकर यूपी और बिहार की ओर जाने और आने वाली रेल(train) मे कुछ ज्यादा ही जद्दोजहद करनी पड़ती है। फिर चाहे वो भारत के किसी भी राज्य से यूपी और बिहार जाती या आती हो। भारतीय रेल मे खासकर यूपी और बिहार की ओर आने या जाने वाली रेल मे कन्फर्म टिकट निकाल पाना किसी जंग जितने से कम नहीं है।

ज्यादातर टिकिट के लिए एजेंट(agent, dalal) पर निर्भर रहना पड़ता है खुद से कन्फर्म टिकिट मिलना मुश्किल ही होता है। टिकिट एजेंट ही कन्फर्म टिकिट दे सकते है, लेकिन तीन से चार गुना अधिक दाम लेते है एक टिकट का। चालू बोगी मे सफऱ करने के लिए बहुत हिम्मत करनी पड़ती है। अब तो चालू(seating coach) और स्लीपर(sleeper coach) बोगी के हालत एक जैसे ही हो गये है। रेलवे वाले वेटिंग टिकट(waiting ticket) जितना चाहिए उतना दे देते है उनको कोई मतलब नहीं होता है की यात्री कैसे जायेगा, उसको कितनी दिक्कत होगी और जिनके पास कन्फर्म टिकट(confirm ticket) है उनको भी बहुत दिक्कत होती है उन यात्रियों से जो वेटिंग टिकट लेकर यात्रा करते है।

कई बार ऐसा भी होता है की एक कन्फर्म टिकट पर तीन चार वेटिंग टिकट वाले यात्री आ जाते है और अपने साथ सामान भी अधिक लाते है और इतना अधिक सामान लाते है की सामान रखने के लिए जगह कम पड़ जाती है। एक तो बैठने को जगह कम पड़ती है उसके ऊपर से इतना सामान लेकर चलते है की सामान भी सीट पर रखनी पड़ती है। हलाकि ऐसी(AC) वाले बोगी मे यह सब दिक्कत नहीं होती है। ऐसी कोच मे यात्रा आरामदायक रहती है। लेकिन कन्फर्म टिकट निकलने की समस्या एक जैसी ही रहती है फिर चाहे स्लीपर कोच हो या ऐसी कोच।

मैं भी यूपी का ही हूँ मेरा भी यूपी आना जाना लगा रहता है लेकिन इन सब दिक्क़तो की वजह से मैं कम ही जाता है जब बहुत जरुरी हो तभी जाता हूँ। मेरा भी रेल यात्रा का काफ़ी अनुभव है। जिसमे से एक अनुभव साझा कर रहा हूँ। मैं एक शादी मे शामिल होने के लिए यूपी जा रहा था। शादी घर की ही थीं इसलिए जाना जरुरी था। घर के सब लोग पहले ही जा चुके थे सिर्फ मैं ही बचा था। मेरा टिकट घरवालों ने तीन महीने पहले से ही निकाल रखा था लेकिन वह टिकट वेटिंग था उनको लगा की तीन महीने का समय है जाने मे तब तक कन्फर्म हो जायेगा। लेकिन उस समय शादियों का सीजन चल रहा था, इसलिये टिकट कन्फर्म नहीं हो पाया 5 नंबर वेटिंग पर आकर रुक गया।

अब शादी को चार ही दिन रह गये थे टिकट का कोई इंतजाम नहीं हो पा रहा था। और मैंने भी नौकरी से छुट्टी लें ली थीं। टिकट कन्फर्म न होने की वजह से मुझे पुरे दिन घर पर ही रुकना पड़ा। आनन फानन मे एक एजेंट का पता लगाया और उससे टिकट निकलने को कहा। उसने कहा की मिल जायेगा टिकट लेकिन कन्फर्म टिकट नहीं मिला, उस टिकट एजेंट ने फिर दूसरे दिन कोशिश किया तो इस बार कन्फर्म टिकट मिल गया लेकिन वह टिकट यूपी से होते हुये बिहार जाने वाली ट्रैन का था। इसलिए उस ट्रैन मे ज्यादातर बिहार के लोग थे जो अपने घर जा रहे थे।

और जैसे की बिहारियों के बारे मे कुछ प्रसिद्ध बाते है जैसे की एक बिहारी सबपर भारी। यही चीज मुझे ट्रैन मे भी देखने को मिली की एक ऐसा भी था जो सबपर भारी पड़ रहा था। उसके बारे मे आगे बताता हूँ। उस दिन जब मुझे ट्रैन पकड़नी थीं एक घंटा पहले ही रेल्वे स्टेशन पहुंच गया था और स्टेशन पहुंचने पर मैंने देखा की जिस ट्रैन मे मुझे जाना था वह ट्रैन पहले से ही स्टेशन पर ख़डी थीं तो मैं जाकर अपनी सीट पर बैठ गया। धीरे धीरे बाकि के यात्री भी आ रहे थे और अपनी सीट पर बैठ रहे थे, और अपना सामान भी सीट के निचे सेट कर कर रहे थे। किसी किसी ने तो इतना सामान लाया था की अपनी सीट के साथ दूसरे की सीट के निचे की जगह भी कब्ज़ा कर ले रहे थे।

मैं अपनी सीट पर बैठा यह सब देख रहा था तभी एक लड़का मेरे पास आया और मुझसे रिक्वेस्ट करने लगा की उसकी बहन का सीट कन्फर्म नहीं हुआ है इसलिए मैं उसकी बहन को अपने सीट पर बैठने के लिए जगह दू। मैंने उसे कहा की अभी बाकि के लोग आए नहीं है इसलिए अभी मैं कुछ नहीं बोल सकता, क्योकि क्या पता बाकि के लोग अपने साथ मे किसी को लेकर आए तो हमें बैठने मे दिक्कत होगी। उस समय इतनी भीड़ थी की ट्रैन मे पैर रखने के लिए भी जगह नहीं थी। स्लीपर बोगी ये आम बात है एक कन्फर्म टिकट पर चार से पांच लोग वेटिंग लेकर चलते ही है। और जिनके साथ कन्फर्म टिकट वाला कोई नहीं होता है वो भी वेटिंग टिकट लेकर स्लीपर बोगी मे चढ़ जाते है और किसी के भी सीट पर बैठ जाते है।

मेरे इतना समझने और मना करने के बाद भी उस युवक ने अपनी बहन को मेरे सीट पर भेज दिया। जब मैंने उस युवक की बहन को देखा तो देखता ही रह गया वो काली थी और बहुत मोटी थी इतनी मोटी की मेरे जैसे तीन दुबले पतले आदमी उतने जगह मे आराम से बैठ जायेंगे। उसने आते ही मेरे सीट पर कब्ज़ा कर लिया वो औरत थी इसलिये इसे कुछ कहना उचित भी नहीं लगा रहा था और इतने महंगे मे टिकट लिया था की मै आराम से इतना लम्बा सफर तय करूँगा लेकिन इतने महंगे टिकट का मुझे कोई फायदा नहीं हुआ मेरा टिकट का पैसा भी बर्बाद हुआ ऐसा लग रहा था।

मेरी सीट पर मुझे ही एडजस्ट करके बैठना पड़ा। फिर उसके बाद तुरंत ही मेरे सामने खिड़की वाली सीट पर कुछ लोग ढेर सारा घर का सामान लेकर आ गए करीब चार या पांच लोग थे। उनके पास इतना सामान था की वो सीट के निचे और सीट के ऊपर भी और अगल बगल वालो के सीट के निचे रखने के बाद मे भी बचा हुआ था। इतना सामान लाया था की अब उनके पास बैठने के लिए भी जगह नहीं बची थी क्योंकि सामान सीट के ऊपर भी रखा था। बाद मे वो सब उस सामान को रखकर चले गये वो सब ये सब सामान ट्रैन मे रखने के लिए आए थे उनके साथ एक पतला सा लड़का था वही इन सब सामान को लेकर गांव जा रहा था। ऐसा लगा रहा था मानो की वह सबकुछ बेचकर गांव जा रहा हो। वह बिहारी सबपर भारी पड़ रहा था क्योंकि उसने इतना सामान लाया थी बाकि लोग अपना सामान कहा रखे यह समझ नहीं आ रहा था। क्योंकि उसने अपना सामान सबके सीट के निचे पहले हीं रख दिया था जिससे सब परेशान हो रहे थे और वो भी परेशान हीं था क्योंकि इतना अधिक सामान होने की वजह से उसे भी बैठने मे दिक्कत हो रही थी। और जब कोई उसे सामान हटाने के लिए कहता तो वह झगड़ा कर लेता था।

एक तरफ लोग उसकी मदद कर रहे थे और वो झगड़ा करने मे लगा हुआ था। एक तो वह सिंगल पसली का था और अकड़ तो इतनी ज्यादा दिखा रहा था की जैसे वह खली जैसा पहलवान हो। इतना सामान लेकर गांव जाते है ऐसा लगता है की मानो इनके गांव मे कुछ मिलता ही नहीं है या सबकुछ यहा से बेचकर जा रहे है। इतना सामान लेकर जाते है, और इतने सामान को इतनी दूर तक लेजाने की मानसिकता की वजह से बाकि के यात्रियों को भी काफ़ी दिक्कत होती है। और सामान भी कुछ खास नहीं होते, खाने की चीजे तेल साबुन, प्लास्टिक के ड्रम, प्लास्टिक की बाल्टी ये सब और न जाने क्या क्या लें जाते है।

यह सब चीजे आम है हर जगह मिल जाती है फिर भी पता नहीं ये लोग क्यू इनता गधा मजूरी करके इतना सामान लें जाते है। खैर यह सब तो पुरे रास्ते भर चलता रहा, मुझे कभी कभी हसीं भी आ जाती थी और मेरा भी मनोरंजन हो रहा था, मैं भी इस पल का आनंद लें रहा था, फिर मैंने सोचा यह सब ऐसे ही चलते रहेगा, और कुछ देर के बाद मैं ऊपर की अपनी सीट पर जाकर सो गया।

to be continue...

- RAKESH PAL
Follow on -